आस्था बनाम प्रदूषण: जहरीली झाग के बीच यमुना में चैती छठ, श्रद्धालुओं की आंखों में आंसू, नेताओं के वादे खोखले

आस्था बनाम प्रदूषण: दिल्ली के कालिंदी कुंज घाट पर एक बार फिर वही दर्दनाक तस्वीर सामने आई — एक तरफ सूर्य देव को अर्घ्य देती श्रद्धालु महिलाएं, और दूसरी तरफ यमुना की सतह पर तैरती सफेद जहरीली झाग। चैती छठ के पावन अवसर पर श्रद्धा और मजबूरी के बीच फंसी इन महिलाओं ने उसी प्रदूषित जल में डुबकी लगाई, जिसे विशेषज्ञ स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक बताते हैं।

झाग क्यों बनती है — विशेषज्ञों की राय

दिल्ली के जल मंत्री प्रवेश साहिब सिंह ने हाल ही में कालिंदी कुंज का दौरा किया और माना कि यमुना में प्रदूषण बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि झाग की मुख्य वजह ओखला बैराज की संरचना और जल प्रवाह है, जहां पानी ऊंचाई से तेजी से गिरता है जिससे पानी में मौजूद अशुद्धियां झाग बनकर ऊपर आ जाती हैं। अधिकारियों ने यह भी बताया कि घरेलू डिटर्जेंट, अवैध डाईंग यूनिट, धोबी घाट और बिना उपचार के नालों का पानी भी झाग को बढ़ाता है।

गुलाबी झाग — नया और ज़्यादा खतरनाक ख़तरा

कुछ दिनों पहले यमुना में सामान्य सफेद झाग की जगह गुलाबी रंग की झाग दिखी, जिसे पर्यावरण विशेषज्ञ और भी गंभीर संकेत मान रहे हैं। उनका कहना है कि यह गुलाबी रंग औद्योगिक कचरे और कपड़ों की रंगाई में इस्तेमाल होने वाले डाई केमिकल से आता है। गुलाबी झाग सफेद झाग की तुलना में अधिक जहरीली मानी जाती है और इससे त्वचा रोग व सांस की बीमारियां हो सकती हैं।

श्रद्धालुओं की आवाज़

खुशबू ने दुख जताते हुए कहा — “दिल्ली जैसे शहर में भी यमुना साफ नहीं हुई। नेता वादे करते हैं, लेकिन असल में कुछ नहीं बदला।” सुचित्रा ने बताया कि पानी इतना गंदा था कि डूबकी लगाने में डर लग रहा था। ललिता ने कहा — “बिहार में व्यवस्था बेहतर होती है, लेकिन किराया बहुत लगता है, इसलिए यहीं पूजा करनी पड़ती है।”

सरकार का पक्ष

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा है कि उनकी सरकार ने 37 पुराने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) को अपग्रेड किया है और 35 नए विकेंद्रीकृत STP चालू किए हैं। जल मंत्री ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) को सभी प्रदूषण स्रोतों की पहचान कर तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं और सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता को बढ़ाकर 1,500 एमजीडी तक ले जाने की बात कही है।

सवाल वही पुराना

पिछले साल यमुना में झाग नियंत्रण के लिए करीब 46 टन रसायन का छिड़काव किया गया, जिस पर लगभग 79 लाख रुपये खर्च हुए — लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं बन पाया। हर साल छठ पर यही तस्वीर, यही वादे और यही सवाल — यमुना कब साफ होगी?

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