नई दिल्ली। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल ही में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पर एंटी-इंकम्बेंसी का असर क्यों नहीं पड़ रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि उनकी दादी इंदिरा गांधी भी 1977 में एंटी-इंकम्बेंसी का शिकार हुई थीं। राहुल का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर के जरिए भाजपा को सत्ता में बनाए रखा जा रहा है। यह आरोप विस्फोटक है। राहुल गांधी के चुनाव संबंधी हालिया बयानों की तरह इसमें भी कुछ असुविधाजनक सच्चाई है, लेकिन साथ ही इसे बहुत सरल बनाने का खतरा भी।
जहां राहुल सही हैं
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता में गंभीर कमी आई है। यह अब सिर्फ विपक्ष का मुद्दा नहीं रह गया है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर), पश्चिम बंगाल में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ श्रेणी, मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाने और अपीलों के निपटारे में देरी जैसे मुद्दों ने पारदर्शिता और प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी संवैधानिक संस्थाओं के बीच ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ की बात कही है।
पश्चिम बंगाल में अब तक करीब 22 लाख नागरिकों ने अपील की है, जिनमें से लगभग 1.26 लाख मामलों का निपटारा हुआ। इनमें से 93 प्रतिशत मामलों में वे वैध मतदाता निकले। जब नागरिकों का वोट देने का अधिकार डेटाबेस की गलती या अपारदर्शी प्रक्रिया से प्रभावित हो सकता है, तो साबित करने का बोझ राज्य पर होना चाहिए, नागरिक पर नहीं। बिहार में मतदान के दौरान सरकारी नकद हस्तांतरण, असम में नफरत भरे भाषणों पर चुप्पी, मान्यता प्राप्त दलों के चुनाव चिह्न छीनने और चुनाव कैलेंडर में फेरबदल जैसे मुद्दे भी चिंता बढ़ाते हैं। चुनाव आयोग इन चिंताओं को सिर्फ राजनीतिक आरोप बताकर टाल नहीं सकता।
जहां राहुल गलत हो सकते हैं
भाजपा की चुनावी प्रभुत्व को मुख्य रूप से ‘रिंग्ड’ या समझौता किए गए चुनावी सिस्टम का नतीजा बताना राजनीतिक सबूतों के पहाड़ को नजरअंदाज करना है। यह कांग्रेस और व्यापक विपक्ष के लिए बचाव का रास्ता भी बन सकता है। 2014 से लगातार चुनावों में मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता, खासकर हिंदी हृदय भूमि और पश्चिमी भारत में, बरकरार रही है। चुनाव एजेंसियां भी साजिश का हिस्सा हैं, यह मानना गलत होगा। भाजपा ने कांग्रेस के मुकाबले मजबूत संगठनात्मक मशीनरी बनाई है—आरएसएस नेटवर्क, वित्तीय संसाधन, संचार तंत्र, वैचारिक प्रस्ताव और राष्ट्रीय नैरेटिव को चुनावी अभियान में बदलने का अनुभव।
इस साल असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 529.38 करोड़ रुपये खर्च बताए, जबकि कांग्रेस ने 248.55 करोड़। अकेले पश्चिम बंगाल में भाजपा का खर्च 286.99 करोड़ था। इसी अवधि में भाजपा के केंद्रीय मुख्यालय की रसीदें करीब 1,473 करोड़ रुपये रहीं, कांग्रेस की सिर्फ 207 करोड़। ये आधिकारिक आंकड़े हैं। ये चुनावी गड़बड़ी साबित नहीं करते, लेकिन संसाधनों की असमानता जरूर दिखाते हैं। कांग्रेस की समस्याएं सिर्फ चुनाव आयोग पर थोपी नहीं जा सकतीं। नेतृत्व संघर्ष, संगठनात्मक पतन, गुटबाजी, दलबदल, कमजोर राज्य इकाइयां और वैकल्पिक राजनीतिक नैरेटिव की कमी ने उसकी गिरावट में योगदान दिया है।
एंटी-इंकम्बेंसी मौजूद है। 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भाजपा को हराया। 2023 में कर्नाटक और 2024 में भाजपा को संसदीय बहुमत गंवाना पड़ा। सवाल यह है कि विपक्ष एंटी-इंकम्बेंसी को स्थायी राष्ट्रीय विकल्प में क्यों नहीं बदल पाया। 2019 में 2018 की राज्य सफलताओं को राष्ट्रीय चुनौती में नहीं बदल पाया। 2024 में इंडिया गठबंधन अंकगणित के बावजूद सुसंगत विकल्प नहीं बन सका। नीतीश कुमार का गठबंधन छोड़ना भी विपक्षी अहंकार की लड़ाइयों को दर्शाता है।
दोनों तरफ जवाबदेही जरूरी
राहुल गांधी चुनाव आयोग से जवाब मांगने में सही हैं। विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाले रेफरी से सिर्फ भरोसा करने को नहीं कहा जा सकता। मतदाता सूची विवाद में ज्यादा पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच की जरूरत है। अगर विपक्ष को लगता है कि जोड़-घटाव में गड़बड़ी है, तो निर्वाचन क्षेत्रवार, जोड़-घटाव और एल्गोरिदम की स्वतंत्र ऑडिट की मांग करनी चाहिए। लेकिन जवाब यहीं नहीं रुकना चाहिए। हर हार का ठीकरा अंपायर पर नहीं फोड़ा जा सकता। कांग्रेस उन चुनावों में भी हारी है जहां ईसी मुद्दा नहीं था। भाजपा की बढ़त सिर्फ रेफरी की कथित नाकामी से नहीं समझाई जा सकती। इसमें राजनीतिक, संगठनात्मक, वैचारिक और नेतृत्व की कहानी है।
2009 से 2024 के बीच भाजपा के वोट 7.84 करोड़ से बढ़कर 23.59 करोड़ हो गए, जबकि कांग्रेस के 11.9 करोड़ से सिर्फ 13.67 करोड़। यह राजनीतिक बदलाव का पैमाना बताता है। चुनाव आयोग को अपनी विश्वसनीयता की कमी का जवाब देना होगा। कांग्रेस को अपनी संगठनात्मक कमी का। भारतीय लोकतंत्र दोनों के जवाब का हकदार है।
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