Cash scandal ‘no illegality’: सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका खारिज की, महाभियोग जांच समिति को मिली हरी झंडी

Cash scandal ‘no illegality’: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने उनके खिलाफ महाभियोग (इम्पीचमेंट) प्रस्ताव की जांच के लिए लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित समिति की वैधता को चुनौती दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि स्पीकर ने समिति गठित करने में “कोई गैरकानूनी काम नहीं किया” और जस्टिस वर्मा को कोई राहत देने की जरूरत नहीं है।

जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने 8 जनवरी को इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा था और आज इसे सुनाया। कोर्ट ने कहा, “हमें जज के अधिकारों और संसद सदस्यों के प्रस्ताव दाखिल करने के स्वतंत्र अधिकार के बीच संतुलन बनाना है।”

मामले का बैकग्राउंड:
• मार्च 2025 में जस्टिस वर्मा (तब दिल्ली हाईकोर्ट में) के सरकारी आवास पर आग लगने की घटना में भारी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद होने के आरोप लगे।
• सुप्रीम कोर्ट के इन-हाउस जांच पैनल ने आरोपों में दम पाया और जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने की सलाह दी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया।
• अगस्त 2025 में संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव दाखिल किए गए। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने प्रस्ताव स्वीकार कर तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार (या कुछ रिपोर्ट्स में जस्टिस मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव), मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य शामिल हैं।
• राज्यसभा में तत्कालीन चेयरमैन जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद डिप्टी चेयरमैन ने प्रस्ताव खारिज कर दिया था।

जस्टिस वर्मा का तर्क: जस्टिस वर्मा ने जजेस (इनक्वायरी) एक्ट की धारा 3(2) का हवाला देते हुए कहा कि जब दोनों सदनों में प्रस्ताव दाखिल हो, तो समिति तभी बनाई जा सकती है जब दोनों सदनों के अध्यक्ष (स्पीकर और चेयरमैन) प्रस्ताव स्वीकार कर लें। उन्होंने राज्यसभा डिप्टी चेयरमैन के फैसले को अवैध बताया।

कोर्ट का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि राज्यसभा द्वारा प्रस्ताव खारिज होने से लोकसभा की कार्रवाई अपने आप रुक नहीं जाती। स्पीकर को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने का अधिकार है। इससे महाभियोग की जांच प्रक्रिया अब बिना रुकावट जारी रहेगी। जस्टिस वर्मा को समिति के सामने लिखित जवाब और व्यक्तिगत पेशी का सामना करना पड़ सकता है।

प्रतिक्रियाएं:
• कानूनी विशेषज्ञों ने इसे न्यायिक जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
• सोशल मीडिया और कुछ यूजर्स ने जस्टिस वर्मा पर भ्रष्टाचार के आरोपों को गंभीर बताते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की, जबकि कोई आधिकारिक राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
• विपक्षी दलों ने पहले इस मामले को उठाया था, लेकिन आज के फैसले पर अभी चुप्पी है।

यह मामला भारतीय न्यायपालिका में दुर्लभ महाभियोग प्रक्रिया का उदाहरण भर मात्र है, जो संविधान के अनुच्छेद 124(4) और जजेस इनक्वायरी एक्ट के तहत चल रही है। जांच समिति की रिपोर्ट के बाद ही संसद में आगे की कार्रवाई तय होगी।

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