Brussels News: यूरोपीय संघ (ईयू) द्वारा हाल के वर्षों में कुरान, शरीयत, इस्लाम और इस्लामोफोबिया जैसे विषयों पर शोध के लिए रिसर्च फंड के उपयोग के चलते विवाद हो गया है। दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों ने इस फंडिंग को लेकर तीखी आलोचना की है, इसे “यूरोपीय संस्कृति को कमजोर करने” और “इस्लामवादी लॉबी” को बढ़ावा देने का प्रयास करार दिया है।
“यूरोपीय कुरान” प्रोजेक्ट पर बवाल
विवाद का केंद्र एक प्रमुख रिसर्च प्रोजेक्ट “द यूरोपीय कुरान” है, जिसके लिए ईयू ने लगभग 9.84 मिलियन यूरो (करीब 82 करोड़ रुपये) आवंटित किए हैं। यह प्रोजेक्ट, जो 2026 तक चलेगा, 1150 से 1850 के बीच यूरोपीय संस्कृति पर कुरान के प्रभाव की जांच करता है। इसकी आलोचना करते हुए दक्षिणपंथी समूहों का दावा है कि यह प्रोजेक्ट यूरोपीय इतिहास को “गलत तरीके से प्रस्तुत” करता है और इस्लाम के प्रभाव को “अतिशयोक्तिपूर्ण” रूप से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की कोशिश करता है। कुछ दक्षिणपंथी नेताओं ने इसे “इस्लामवादी एजेंडे” को बढ़ावा देने का एक भर हिस्सा है।
दक्षिणपंथी दलों की आपत्तियां
दक्षिणपंथी दलों का कहना है कि ईयू को इस तरह के शोध पर भारी-भरकम धनराशि खर्च करने के बजाय यूरोपीय संस्कृति, इतिहास और मूल्यों के संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए। उनका आरोप है कि इस तरह के प्रोजेक्ट्स यूरोप की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करते हैं और “इस्लामोफोबिया” जैसे विषयों पर शोध के नाम पर इस्लाम की आलोचना को दबाने की कोशिश की जा रही है। कुछ नेताओं ने यह भी सवाल उठाया कि क्या इन प्रोजेक्ट्स के पीछे कोई “छिपा हुआ एजेंडा” है, जिसमें इस्लामवादी संगठनों का प्रभाव हो सकता है।
यूरोपीय आयोग का जवाब
यूरोपीय आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि रिसर्च फंडिंग का उद्देश्य ऐतिहासिक और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा देना है। आयोग के अनुसार, “द यूरोपीय कुरान” जैसे प्रोजेक्ट्स का मकसद यूरोप के इतिहास में विभिन्न संस्कृतियों के योगदान को समझना है, न कि किसी धार्मिक या राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देना। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि रिसर्च फंडिंग की प्रक्रिया पारदर्शी है और शैक्षणिक कसौटियों पर आधारित है।
विशेषज्ञों की राय
कुछ इस्लाम विशेषज्ञों और इतिहासकारों ने इस प्रोजेक्ट का समर्थन किया है, उनका कहना है कि यह यूरोप और इस्लाम के बीच ऐतिहासिक संबंधों को समझने में मदद करेगा। उनके मुताबिक, मध्यकाल से लेकर आधुनिक युग तक इस्लाम ने यूरोपीय कला, साहित्य और विज्ञान पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस तरह के शोध को गलत तरीके से पेश किए जाने का खतरा है, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।
भारत-ईयू संबंधों का संदर्भ
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच सांस्कृतिक और रणनीतिक सहयोग बढ़ रहा है। भारत और ईयू ने जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ गंगा पहल और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत किया है। हालांकि, ईयू द्वारा भारत के आंतरिक मामलों, जैसे जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर टिप्पणी, ने दोनों पक्षों के बीच तनाव को भी जन्म दिया था|
आगे की राह
जहां एक तरफ ईयू अपनी बहुसांस्कृतिक नीतियों और शोध के माध्यम से समावेशिता को बढ़ावा देना चाहता है, वहीं दक्षिणपंथी दल इसे यूरोपीय मूल्यों के लिए खतरे के रूप में देखते हैं। इस मुद्दे पर बहस आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है, क्योंकि 2026 में “द यूरोपीय कुरान” प्रोजेक्ट के परिणाम सामने आएंगे।
इस बीच, यूरोपीय संघ ने स्पष्ट किया है कि वह अपने रिसर्च फंडिंग के फैसलों का बचाव करता रहेगा और ऐतिहासिक शोध को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।

