किले ढहे, समीकरण बदले, बंगाल-असम में भाजपा की सेंध और विजय की जीत क्या…?

नई दिल्ली। छह उपचुनावों के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारतीय राजनीति में कोई भी गढ़ अब अभेद्य नहीं रहा। पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा ने मुस्लिम बहुल सीटों पर सेंध लगाई, जबकि तमिलनाडु में अभिनेता-से-मुख्यमंत्री बने सी. जोसेफ विजय की तमिलगा वेट्री कजगम (टीवीके) ने अपनी पहली परीक्षा में दोनों सीटें जीतकर अपनी पकड़ मजबूत की। पुडुचेरी में भी सत्ताधारी एनडीए सहयोगी एआईएनआरसी ने अपनी सीट बचाई। ये नतीजे सिर्फ जीत-हार के आंकड़े नहीं, बल्कि स्थापित राजनीतिक समीकरणों के टूटने और नए समीकरण बनने की कहानी हैं।

बंगाल में भाजपा का दोहरा प्रहार

पश्चिम बंगाल में भाजपा ने नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों विधानसभा सीटें जीत लीं। नंदीग्राम मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का गढ़ है। अधिकारी ने विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटें जीती थीं। उन्होंने भवानीपुर बरकरार रखते हुए नंदीग्राम खाली कर दी थी। उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार हासिरानी रथ ने कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को रिकॉर्ड 1,22,753 मतों के अंतर से हराया। रथ को करीब 1.64 लाख वोट मिले, जबकि प्रधान को मात्र 41,674। यह नंदीग्राम में अब तक का सबसे बड़ा अंतर माना जा रहा है।

लेकिन असली सरप्राइज रेजीनगर से आया। मुर्शिदाबाद जिले की यह सीट करीब 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाली है। यहां भाजपा ने पहले कभी ठोस पैठ नहीं बनाई थी। मई 2026 के विधानसभा चुनाव में आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) के प्रमुख हुमायूं कबीर ने यहां जीत दर्ज की थी। कबीर ने नोवादा सीट बरकरार रखते हुए रेजीनगर खाली की थी। उनके बेटे गोलम नबी आजाद उपचुनाव में मैदान में थे। लेकिन भाजपा के शंखरव सरकार ने उन्हें 75,816 मतों के बड़े अंतर से हरा दिया। सरकार को 1,29,914 वोट मिले, जबकि आजाद को करीब 54,000।

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इसे साम्प्रदायिक राजनीति की जगह विकास की राजनीति की जीत बताया। उन्होंने कहा कि रेजीनगर के मतदाताओं ने साम्प्रदायिक नारों को ठुकराया और सरकार के कल्याणकारी कार्यक्रमों, खासकर अन्नपूर्णा योजना को अपना समर्थन दिया। विपक्ष ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए, लेकिन नतीजे साफ थे।

असम में नगांव का बड़ा संदेश

असम की नगांव लोकसभा सीट पर भी भाजपा ने बड़ा उलटफेर किया। यह सीट 2019 और 2024 में कांग्रेस के पास थी। यहां 55 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। भाजपा उम्मीदवार और पूर्व आईएएस अधिकारी देवाशीष शर्मा ने एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल को 1,42,224 मतों के अंतर से हराया। शर्मा को 7,14,349 वोट मिले, अजमल को 5,72,125 और कांग्रेस की शिबामोनी बोरा तीसरे स्थान पर सिमट गईं (1,29,492 वोट)।

यह सीट इसलिए खाली हुई थी क्योंकि पूर्व कांग्रेस सांसद प्रद्युत बरदोलोई भाजपा में शामिल होकर दिस्पुर से विधायक चुने गए थे। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा ने इसे विकास की राजनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अल्पसंख्यकों के समर्थन का प्रमाण बताया। कांग्रेस के लिए यह झटका इसलिए भी बड़ा है क्योंकि विपक्ष बंटा हुआ था और अल्पसंख्यक वोटों का एक बड़ा हिस्सा एआईयूडीएफ की तरफ चला गया।

तमिलनाडु में विजय की टीवीके का जलवा

तमिलनाडु में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की टीवीके ने मदुरांतकम और धारापुरम दोनों विधानसभा सीटें जीत लीं। मदुरांतकम में मरागथम कुमारवेल ने डीएमके प्रत्याशी को करीब 20,000 मतों से हराया, जबकि धारापुरम में पी. सत्यबामा ने करीब 9,500 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। दोनों सीटें पहले एआईएडीएमके के पास थीं। दोनों विधायकों ने इस्तीफा देकर टीवीके जॉइन किया था और अब उसी पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की।

टीवीके की ताकत विधानसभा में 107 से बढ़कर 109 हो गई है। विजय ने इसे व्यक्तिगत हमलों, महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियों और विश्वासघात के खिलाफ जनता का फैसला बताया। डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने इसे “धोखे की अस्थायी जीत” करार दिया। एआईएडीएमके के लिए यह और बड़ा संकट है क्योंकि पार्टी पहले से ही गुटबाजी और दलबदल से जूझ रही है।

पुडुचेरी में एनडीए की सफलता

पुडुचेरी की थट्टानचावड़ी सीट पर सत्ताधारी ऑल इंडिया एन.आर. कांग्रेस (एआईएनआरसी) के अशोक आनंद ने कांग्रेस प्रत्याशी को 8,482 मतों से हराया। यह सीट मुख्यमंत्री एन. रंगसामी ने खाली की थी।

समीकरणों में बड़ा बदलाव

ये नतीजे तीन बड़े संदेश देते हैं। पहला, मुस्लिम बहुल सीटों पर भी भाजपा अब चुनौती दे रही है। बंगाल और असम दोनों जगह विकास और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए पार्टी ने अल्पसंख्यक मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश की है। दूसरा, कांग्रेस की पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक पर निर्भरता अब उतनी सुरक्षित नहीं रही। तीसरा, तमिलनाडु में विजय की टीवीके एआईएडीएमके की कीमत पर अपनी जगह बना रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन जीतों को भाजपा-एनडीए की सुशासन की एजेंडे से जनता के गहरे जुड़ाव का प्रमाण बताया। वहीं विपक्ष इन नतीजों को स्थानीय परिस्थितियों और बंटे हुए विपक्ष का परिणाम बता रहा है। कुल मिलाकर, अक्टूबर 2026 के ये उपचुनाव सिर्फ सत्ताधारी दलों की जीत नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप का संकेत हैं। पुराने गढ़ ढह रहे हैं और नए समीकरण आकार ले रहे हैं।

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