नोएडा। देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत नोएडा के गरीब तबके के लिए उम्मीद की किरण तो है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। शहर में लगभग 85 से अधिक अस्पताल इस योजना के तहत सूचीबद्ध (Empanelled) हैं, जिनमें सरकारी संस्थान जैसे GIMS ग्रेटर नोएडा और जिला अस्पताल के साथ-साथ कई मध्यम स्तर के निजी अस्पताल शामिल हैं। हालांकि, नोएडा के वे ब्रांडेड या नामी सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल इस सूची से गायब हैं, जहाँ मरीज सबसे बेहतर इलाज की उम्मीद रखते हैं। सूत्र बताते है कि ब्रांडेड निजी अस्पताल अधिक मुनाफे के चलते पीएम के सपने को भी ठेस पहुचा रहे है। इतना ही नही नोएडा प्राधिकरण से जमीन आवंटन कराते वक्त लीजडीड पर सहमति दी थी कि अस्पताल कुछ प्रतिशत गरीबों का इलाज करेगा मगर यह केवल कागजों तक सिमट कर रह गया है। प्राधिकरण सब कुछ जानकर मौन है। ऐसे में यही सवाल है कि क्या गरीब लोगों को निजी अस्पतालों में कम पैसे में इलाज करने का अधिकार नही है।
नामी अस्पताल क्यों नहीं दिखा रहे रुचि?
बड़े निजी अस्पतालों का इस योजना से किनारा करना केवल एक संयोग नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरे आर्थिक कारण और प्रशासनिक चुनौतियां हैं। विस्तार से विश्लेषण नीचे दिया गया है:
1. सरकारी दरों और वास्तविक खर्च में भारी अंतर नामी अस्पतालों के इस योजना से पीछे हटने का सबसे बड़ा कारण ‘लो पैकेज रेट’ (Low Package Rates) है। आयुष्मान योजना के तहत सरकार ने विभिन्न सर्जरी और इलाज की दरें तय की हुई हैं।
- उदाहरण के लिए: यदि किसी बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल में एक सर्जरी का खर्च ₹2 लाख आता है, तो सरकार उसके लिए मात्र ₹80,000 से ₹1 लाख तक ही रीइम्ब्रस (भुगतान) करती है।
- नामी अस्पतालों का तर्क है कि उनके पास उच्च स्तर की तकनीक, विशेषज्ञ डॉक्टर और महंगी बुनियादी सुविधाएं हैं, जिनका खर्च सरकारी दरों में पूरा नहीं हो पाता।
2. भुगतान में देरी (Delayed Payments) निजी अस्पतालों के संगठनों (जैसे AHPI और IMA) का आरोप है कि सरकार की ओर से इलाज का पैसा मिलने में 6 से 9 महीने की देरी होती है। बड़े अस्पतालों को अपने कर्मचारियों का वेतन, दवाओं की खरीद और मशीनरी का रखरखाव समय पर करना होता है। बकाया राशि (Dues) के करोड़ों में पहुंचने के कारण कई अस्पताल इस योजना को ‘वित्तीय रूप से घाटे का सौदा’ मानने लगे हैं।
3. कमाई कम होने का डर (Profit Margin) निजी अस्पतालों का मुख्य राजस्व (Revenue) उन मरीज़ों से आता है जो नकद भुगतान करते हैं या जिनके पास महंगी कॉर्पोरेट बीमा पॉलिसी होती है। आयुष्मान कार्ड के मरीज़ों को शामिल करने का मतलब है कि उन्हें अपने बेड और संसाधन कम कीमत पर ब्लॉक करने पड़ेंगे, जिससे उनकी कुल कमाई पर सीधा असर पड़ता है।
मरीजों पर क्या हो रहा है असर?
जब नामी अस्पताल इस योजना से नहीं जुड़ते, तो इसका सीधा खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ता है:
- इलाज की गुणवत्ता से समझौता: मरीज़ों को छोटे या मध्यम स्तर के अस्पतालों में जाना पड़ता है, जहाँ अक्सर वेंटिलेटर, डायलिसिस या एडवांस आईसीयू जैसी सुविधाओं की कमी होती है।
- रेफरल का चक्कर: अक्सर गंभीर मामलों में छोटे अस्पताल मरीज़ को बड़े अस्पतालों में रेफर कर देते हैं, लेकिन बड़े अस्पताल आयुष्मान कार्ड स्वीकार नहीं करते, जिससे मरीज़ इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं।
- भ्रष्टाचार की गुंजाइश: कई बार सूचीबद्ध अस्पताल ‘बेड खाली न होने’ का बहाना बनाकर मरीज़ों को लौटा देते हैं या गुप्त रूप से अतिरिक्त पैसों की मांग करते हैं।
नोएडा के प्रमुख सूचीबद्ध अस्पताल (एक झलक)
वर्तमान में नोएडा और आसपास के क्षेत्रों में ये अस्पताल आयुष्मान कार्ड स्वीकार कर रहे हैं:
- सरकारी: GIMS (ग्रेटर नोएडा), जिला अस्पताल (सेक्टर-30)।
- निजी: मेट्रो हॉस्पिटल (सेक्टर-12), विनायक हॉस्पिटल (सेक्टर-27), फेलिक्स हॉस्पिटल (सेक्टर-137), सुमित्रा हॉस्पिटल (सेक्टर-35), और कैलाश हॉस्पिटल (जेवर शाखा)। ये सभी अस्पताल सूचना के आधर पर दिये गए है। इन में समय समय पर बदलाव भी होते है।
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