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तपती धरती, सुलगता डेटा: गर्मी की मार अब इंसानों के साथ AI मशीनों पर भी, किसान सबसे ज्यादा परेशान – जय हिन्द जनाब तपती धरती, सुलगता डेटा: गर्मी की मार अब इंसानों के साथ AI मशीनों पर भी, किसान सबसे ज्यादा परेशान – जय हिन्द जनाब

तपती धरती, सुलगता डेटा: गर्मी की मार अब इंसानों के साथ AI मशीनों पर भी, किसान सबसे ज्यादा परेशान

इस साल की भीषण गर्मी ने सिर्फ आम आदमी और किसानों का ही हाल बेहाल नहीं किया है, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों को भी हिलाकर रख दिया है। यूरोप और अमेरिका में जारी रेकॉर्ड तोड़ हीटवेव ने यह साफ कर दिया है कि अब अरबों डॉलर की AI क्रांति भी मौसम की मार से अनछुई नहीं रह सकती। दूसरी तरफ भारत में कमजोर मॉनसून और बढ़ती लू ने खेत-खलिहान से लेकर शहर की सड़कों तक हाहाकार मचा दिया है।

जब चिप्स भी पसीना बहाने लगें

यूरोप में पिछले कुछ हफ्तों से चल रही असाधारण गर्मी ने सिर्फ लोगों को राहत के लिए पंखे-कूलर तक नहीं पहुँचाया, बल्कि बिजली के भूमिगत केबलों पर भी भारी दबाव डाला, जिससे कई शहरों में बार-बार बिजली गुल होने की नौबत आ गई। ऐसे में जब एक-एक डेटासेंटर लाखों घरों जितनी बिजली खींचता है, तो गर्मी और बढ़ी हुई बिजली की मांग एक साथ मिलकर ग्रिड पर दोहरा बोझ डाल रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने सफाई दी है कि उसके डेटासेंटर अलग-अलग मौसमी परिस्थितियों में भी भरोसे के साथ काम कर सकें, इसके लिए साइट चुनाव, बैकअप सिस्टम और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग पर खास ध्यान दिया जा रहा है। इसी बीच एनवीडिया ने हाल ही में ऐलान किया कि उसकी नई पीढ़ी के AI सर्वर अब पूरी तरह लिक्विड कूलिंग पर शिफ्ट हो रहे हैं  यानी पानी और हवा से ठंडा करने वाले पुराने पंखों की जगह अब एक बंद लूप में दौड़ने वाला कूलेंट चिप्स को ठंडा रखेगा। खास बात यह है कि यह कूलेंट 45 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान पर भी आराम से काम कर सकता है, जो पुराने सिस्टम से कहीं ज्यादा है। कंपनी का दावा है कि इससे पानी की खपत लगभग शून्य के करीब आ जाएगी और बिजली की भारी बचत भी होगी। हालांकि कई जानकार यह भी मान रहे हैं कि यह समाधान सिर्फ डेटासेंटर की चार दीवारी के भीतर के पानी के इस्तेमाल को ठीक करता है, जबकि बिजली उत्पादन और चिप बनाने में लगने वाले पानी का बड़ा हिस्सा अब भी समस्या बना हुआ है। असल चुनौती यह है कि नई पीढ़ी के रैक एक-एक कैबिनेट में सौ किलोवाट से ज्यादा बिजली खपाने लगे हैं इस स्तर पर पारंपरिक एयर-कूलिंग अब तकनीकी रूप से कारगर ही नहीं रहती। यही वजह है कि लगभग हर बड़ी क्लाउड कंपनी अब लिक्विड कूलिंग की तरफ रुख कर रही है, और इसका असर इतना बड़ा है कि इस खबर के बाद एयर कंडीशनिंग बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट देखी गई।

भारत में आम जनता और किसान दोनों बेहाल

भारत की तस्वीर इससे जुदा नहीं है। मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि इस साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, गुजरात और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में सामान्य से ज्यादा दिन लू चलेगी। पिछले कुछ हफ्तों में कई राज्यों में तापमान 42 से 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच गया, जिससे आम लोगों का जीना मुश्किल हो गया। दिल्ली-एनसीआर से लेकर मुंबई की झुग्गियों तक, लोग चिलचिलाती गर्मी से बचने के लिए जैसे-तैसे जगह तलाशते दिखे। लेकिन सबसे बड़ी मार किसानों पर पड़ी है। इस साल मॉनसून की शुरुआत खुद ही बेहद कमजोर रही कई इलाकों में सामान्य से साठ फीसदी से भी कम बारिश दर्ज हुई, जो पिछले एक दशक में सबसे कमजोर शुरुआत मानी जा रही है। धान, कपास, सोयाबीन, दलहन और तिलहन जैसी खरीफ फसलों की बुवाई सामान्य से बहुत पीछे चल रही है, क्योंकि खेतों में बीज डालने लायक नमी ही नहीं बन पा रही। गर्म मिट्टी में हफ्तों पड़े रहने से कई बीज अंकुरित होने की क्षमता तक खो रहे हैं। इससे भी बड़ी मुसीबत यह है कि सीधी हीटवेव से खड़ी फसल पूरी तरह बर्बाद नहीं होती, बस उसकी पैदावार और गुणवत्ता गिर जाती है और भारत की मौजूदा फसल बीमा व्यवस्था ऐसे “आधे नुकसान” को ठीक से पकड़ ही नहीं पाती। नतीजा यह कि किसान को आर्थिक चोट तो लगती है, मगर बीमा का मुआवजा अक्सर नहीं मिल पाता। कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि अल नीनो की दस्तक की वजह से इस साल देश के सैकड़ों जिलों में सामान्य से कम बारिश की आशंका है, जिससे छोटे और सीमांत किसान, खेतिहर मजदूर और ग्रामीण महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले वर्गों में शामिल हैं।

एक ही सिक्के के दो पहलू

गौर करने वाली बात यह है कि चाहे सिलिकॉन वैली का चमचमाता डेटासेंटर हो या भारत के किसी गांव का सूखा खेत, दोनों ही जगह बढ़ता तापमान अब सिर्फ मौसम की खबर नहीं बल्कि सीधा आर्थिक झटका बन चुका है। जहां टेक कंपनियां करोड़ों डॉलर खर्च करके अपनी मशीनों को बचाने के लिए नई तकनीक ला रही हैं, वहीं आम किसान के पास न पर्याप्त बीमा कवर है और न ही गर्मी से लड़ने के साधन। जानकारों का कहना है कि अब वक्त आ गया है कि सरकार और निजी क्षेत्र दोनों मिलकर हीटवेव को एक स्थायी जोखिम मानें न कि एक अस्थायी मौसमी झंझट और इसके लिए ठोस, दीर्घकालिक योजना बनाएं। यह रिपोर्ट हाल की मौसम विज्ञान विभाग की चेतावनियों, उद्योग जगत की घोषणाओं और कृषि क्षेत्र की ताजा रिपोर्टों पर आधारित है।

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