उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली में “शांति भंग” (BNSS) धाराओं के कथित दुरुपयोग पर सख्त रुख अपनाते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और बिना वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए किसी नागरिक को जेल में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने अवैध हिरासत में रखे गए व्यक्ति को मुआवजे का आदेश देने के साथ-साथ दोषी अधिकारियों के वेतन से वसूली का रास्ता भी साफ कर दिया है।
फैसला किस मामले में हुआ
हबीयस कॉर्पस रिट संख्या 317/2026 में याचिकाकर्ता मंसूर अहमद उर्फ़ लल्लू ने आरोप लगाया कि प्रयागराज के खीरी थाना क्षेत्र से 19 मार्च 2026 की रात लगभग 12:50 बजे पुलिस ने उन्हें उनके घर से उठा लिया। पुलिस ने कार्रवाई के लिए BNSS की धारा 170, 126 और 135 का हवाला दिया। आरोपी को बाद में सहायक पुलिस आयुक्त और विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, जहां कथित तौर पर एक मुद्रित प्रोफार्मा पर बिना पर्याप्त कानूनी प्रक्रिया व सुनवाई के आदेश पारित कर उसे सीधे जेल भेज दिया गया। रिकॉर्ड में कहीं भी यह उल्लेख नहीं था कि मंसूर ने व्यक्तिगत बांड भरने से मना किया था, फिर भी उसे 27 मार्च 2026 तक हिरासत में रखा गया।
अदालत की टिप्पणियाँ और निष्कर्ष
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने पाया कि पुलिस कमिश्नरों तथा उनके अधीनस्थ अधिकारियों को दी गई मजिस्ट्रेटी शक्तियों का कई मामलों में जमकर दुरुपयोग हो रहा है। अदालत ने पेश किए गए आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि गाजियाबाद और प्रयागराज सहित अनेक जिलों में BNSS की धारा 126, 135 और 170 के आधार पर हजारों नागरिकों को एक दिन से लेकर 20 दिनों तक जेल में रखा गया — जिसे अदालत ने “बेहद चौंकाने वाली स्थिति” करार दिया। अदालत ने कहा कि इस तरह का व्यवहार संवैधानिक अधिकारों के अनुकूल नहीं है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भारी हनन है।
हाईकोर्ट के निर्देश (समूचे प्रदेश के लिए)
अदालत ने राज्य सरकार द्वारा नई नीति बनाए जाने तक निम्न निर्देश लागू कर दिए हैं: जमानती की आवश्यकता समाप्त: प्रिवेंटिव डिटेंशन अथवा शांति भंग की कार्रवाई में अब केवल व्यक्तिगत बांड लिया जाएगा। बांड की अधिकतम राशि ₹20,000 रहेगी। किसी बाहरी जमानती (surety) की मांग नहीं होगी।
बांड भरते ही तत्काल रिहाई: यदि व्यक्ति व्यक्तिगत बांड भर देता है तो उसे तुरंत रिहा किया जाएगा।
इनकार का ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड जरूरी: यदि कोई व्यक्ति बांड भरने से इनकार करता है तो उसका इनकार लिखित रूप में दर्ज करने के साथ-साथ ऑडियो-वीडियो माध्यम में रिकॉर्ड करना अनिवार्य होगा। 24 घंटे से अधिक अवैध हिरासत पर मुआवजा: यदि किसी नागरिक को बिना वैध कानूनी आधार के 24 घंटे से अधिक हिरासत में रखा जाता है तो राज्य सरकार उसे ₹25,000 प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा देगी। दोषी अधिकारियों की सैलरी से वसूली: मुआवजे की पूरी राशि संबंधित दोषी अधिकारी या मजिस्ट्रेट के वेतन से वसूल की जाएगी। विभागीय कार्रवाई: दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही भी शुरू की जाएगी।
प्रभाव और प्रतिक्रिया
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय प्रदेश में पुलिस तथा कार्यपालक मजिस्ट्रेटों द्वारा शांति भंग धाराओं के प्रयोग के तरीके को बदल सकता है और अधिकारियों के व्यवहार में जवाबदेही सुनिश्चित कर सकता है। आदेश से यह स्पष्ट संदेश गया है कि केवल आशंका के आधार पर किसी की स्वतंत्रता को लंबे समय तक प्रतिबंधित नहीं किया जा सकेगा।
राज्य प्रशासन और पुलिस की प्रतिक्रिया अभी सीमित
अभी तक राज्य सरकार और पुलिस विभाग की ओर से आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है। प्रयागराज पुलिस कमिश्नर को हाईकोर्ट ने 14 सितंबर 2026 तक आदेश के अनुपालन की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए हैं। इस बीच मानवाधिकार कार्यकर्ता और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा और पुलिस जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
न्यायिक आदेश का भविष्य
अदालत के निर्देशों के पालन और उनके लागू होने के तरीकों पर आने वाले हफ्तों में सरकारी नीतिगत बदलाव और विभागीय आदेशों का असर दिखेगा। यदि राज्य सरकार निर्देशों के प्रति उचित संशोधन और प्रशिक्षण न कराए तो उच्च न्यायालय के विवेचनात्मक आदेशों और शायद अतिरिक्त मुकदमों के माध्यम से पालन की निगरानी जारी रहेगी। नोट: फैसले में मंसूर अहमद को 8 दिन की अवैध हिरासत के लिए ₹2 लाख मुआवजा देने का भी आदेश शामिल है, जिसकी वसूली भी संबंधित दोषी सहायक पुलिस आयुक्त के वेतन से करने का निर्देश दिया गया है।

