अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन 16 राज्यों (जिनमें आयोवा, मिसौरी, कंसास, ओकलाहोमा, टेनेसी और यूटा प्रमुख हैं) के विधेयकों से $164 बिलियन (लगभग 13.5 लाख करोड़ रुपये) का EdTech उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
अभिभावक और विधायक स्क्रीन एडिक्शन, डेटा प्राइवेसी और AI के संभावित नुकसान (जैसे मानसिक स्वास्थ्य पर असर) को लेकर चिंतित हैं। न्यूयॉर्क, मिनेसोटा, कैलिफोर्निया और वर्जीनिया जैसे राज्यों में AI चैटबॉट्स पर अलग-अलग बिल पास हो चुके हैं या आगे बढ़ रहे हैं, जिनमें नाबालिगों के लिए unsafe फीचर्स वाली चैटबॉट्स पर प्रतिबंध और डिस्क्लोजर अनिवार्य करने के प्रावधान शामिल हैं। फेडरल स्तर पर भी GUARD Act और SAFEBOTs Act जैसे प्रस्ताव चर्चा में हैं।
दूसरी ओर, भारत का कदम NEP 2020 और NCF-SE 2023 के अनुरूप है। शिक्षा मंत्रालय ने अक्टूबर 2025 में घोषणा की थी कि AI एवं कम्प्यूटेशनल थिंकिंग क्लास 3 से 8 तक 2026-27 से और क्लास 9-10 में 2027-28 से अनिवार्य होगा। CBSE और IIT मद्रास की कमिटी ने फ्रेमवर्क तैयार किया है। दिसंबर 2025 तक शिक्षक प्रशिक्षण (NISHTHA के तहत) और सामग्री तैयार हो चुकी होगी। मंत्रालय का कहना है कि यह कदम बच्चों को भविष्य की स्किल्स से लैस करेगा, बिना इंसानों की जगह लेने के।
यह विरोधाभास वैश्विक बहस को दर्शा रहा है एक तरफ अमेरिका में “डिजिटल बैकलैश” और स्क्रीन-फ्री स्कूलों की मांग, तो दूसरी तरफ भारत की “AI फॉर पब्लिक गुड” वाली नीति। EdTech कंपनियां अब अमेरिका में लॉबी कर रही हैं, जबकि भारतीय स्कूलों में तैयारियां तेज हो गई हैं। अभिभावकों और शिक्षकों के लिए सवाल वही है AI बच्चों का साथी बने या खतरा? भारत का अनुभव आने वाले वर्षों में ग्लोबल मॉडल साबित हो सकता है।

