Noida News: नोएडा के सेक्टर 150 में युवराज मेहता की मौत के बाद मामला सिर्फ एक हादसे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद नोएडा प्राधिकरण के सीईओ को पद से हटाया जाना और जिला प्रशासन, खासकर डीएम की भूमिका पर उठ रहे सवाल इस बात का संकेत हैं कि मामला उच्च स्तर पर गंभीर माना जा रहा है। सरकार ने प्रकरण की जांच के लिए एसआईटी गठित की है, जो दूसरी बार नोएडा प्राधिकरण के दफ्तर पहुंचकर रिकॉर्ड, फाइलें और अधिकारियों से पूछताछ कर चुकी है। सूत्रों के अनुसार एसआईटी जो अफसर जिम्मेदार हो सकते है उनसे बारी बारी बुलाकर पूछताछ कर रही है।
एसआईटी की जांच के दायरे में क्या-क्या
एसआईटी यह जानने की कोशिश कर रही है कि युवराज मेहता की मौत किन परिस्थितियों में हुई और क्या यह लापरवाही, नियमों की अनदेखी या सिस्टम की विफलता का नतीजा थी। जांच में प्राधिकरण की फाइलों, स्वीकृतियों, निरीक्षण रिपोर्ट और संबंधित विभागों के आपसी समन्वय की भी पड़ताल की जा रही है। यह भी देखा जा रहा है कि घटना से पहले किसी तरह की शिकायत या चेतावनी सामने आई थी या नहीं, और यदि आई थी तो उस पर क्या कार्रवाई हुई।
प्राधिकरण की भूमिका पर सवाल
नोएडा प्राधिकरण पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि उसके अधीन क्षेत्र में सुरक्षा मानकों और नियमों का पालन क्यों नहीं सुनिश्चित हुआ। निर्माण, रखरखाव, निरीक्षण और अनुमति देने वाले विभागों की जिम्मेदारी तय होना तय माना जा रहा है। यदि किसी परियोजना या स्थल पर खामियां थीं और उन्हें नजरअंदाज किया गया, तो इसके लिए संबंधित विभागों के अधिकारियों की जवाबदेही बनती है। सीईओ को हटाए जाने के बाद यह साफ है कि प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही की आशंका जताई जा रही है।
जिला प्रशासन और डीएम की जिम्मेदारी
जिला प्रशासन की भूमिका भी जांच के घेरे में है। डीएम जिले में प्रशासनिक समन्वय के प्रमुख होने के साथ साथ आपदा प्रबंधन कमेटी के हेड होते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या समय रहते निगरानी और समन्वय किया गया था या नहीं। यदि किसी तरह की शिकायतें जिला प्रशासन तक पहुंचीं और उन पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो जिम्मेदारी तय हो सकती है।
तकनीकी विभाग और निरीक्षण तंत्र
ऐसे मामलों में तकनीकी विभागों की भूमिका भी अहम होती है। सिविल, इंजीनियरिंग, सेफ्टी और मेंटेनेंस से जुड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे समय-समय पर निरीक्षण करें और खामियां मिलने पर तुरंत कार्रवाई करें। यदि निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहा और जमीनी हकीकत को नजरअंदाज किया गया, तो यह गंभीर लापरवाही मानी जाएगी।
नीतिगत और सिस्टम फेल्योर का पहलू
युवराज मेहता की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कहीं यह पूरा मामला सिस्टम फेल्योर का तो नहीं। यदि नियम मौजूद थे लेकिन उनका पालन नहीं हुआ, या जिम्मेदार अधिकारियों ने आंख मूंद ली, तो यह सामूहिक प्रशासनिक विफलता मानी जाएगी।
एसआईटी रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
फिलहाल पूरे मामले में एसआईटी की रिपोर्ट का इंतजार है। रिपोर्ट के आधार पर यह तय होगा कि किन-किन अधिकारियों, विभागों या एजेंसियों की जिम्मेदारी बनती है और आगे किस स्तर तक कार्रवाई होगी। युवराज मेहता की मौत ने साफ कर दिया है कि लापरवाही की कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है, और अब सवाल यही है कि क्या इस बार जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई होगी या मामला फिर फाइलों में दब जाएगा।

