“बेटी कोई सामान नहीं!”: मेरठ में रिटायर्ड जज ने तलाक के मौके पर बजवाए ढोल-नगाड़े, वायरल हुआ जश्न

“बेटी कोई सामान नहीं!”: उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यहाँ एक रिटायर्ड जज ने अपनी बेटी के तलाक को दुख नहीं, बल्कि उसके आत्मसम्मान और नई ज़िंदगी की शुरुआत का जश्न बनाया।

क्या है पूरा मामला?

मेरठ के रिटायर्ड जज ज्ञानेंद्र शर्मा की बेटी प्रणिता की शादी 14 दिसंबर 2018 में एक आर्मी मेजर से हुई थी। शादी के कुछ समय बाद ससुराल में मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना शुरू हो गई। एक बेटा होने के बाद भी हालात नहीं सुधरे और मामला फैमिली कोर्ट पहुँच गया। 4 अप्रैल 2026 को फैमिली कोर्ट के जज शक्तिपुत्र तोमर ने तलाक को मंजूरी दे दी।  और जैसे ही फैसला आया, जो दृश्य सामने आया वह पूरे भारत ने पहले कभी नहीं देखा था।

ढोल की थाप पर कोर्ट से घर तक जश्न

तलाक मिलते ही डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा और परिवार के सदस्यों ने काली टी-शर्ट पहनी, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था — “I Love My Bitiya”। जैसे ही बेटी कोर्ट से घर पहुँची, पिता ने ढोल-नगाड़े बजवाए, परिवार के सदस्य नाचते-गाते रहे, फूल बरसाए गए और मिठाइयाँ बाँटी गईं।

पिता का दो टूक संदेश

डॉ. शर्मा ने साफ कहा, “मेरी बेटी कोई सामान नहीं है कि उसे कहीं भी छोड़ दिया जाए। उसका सम्मान सबसे पहले है।” उन्होंने न कोई एलिमनी माँगी, न किसी तरह की आर्थिक माँग रखी सिर्फ बेटी को इज़्ज़त के साथ वापस लाए।

कौन हैं प्रणिता?

प्रणिता वशिष्ठ मनोविज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट हैं और मेरठ की ‘प्रणव वशिष्ठ ज्यूडिशियल अकादमी’ में फाइनेंस डायरेक्टर हैं। उन्होंने महिलाओं से अपील की कि अगर कोई प्रताड़ना सह रही हैं तो चुप न रहें, आत्मनिर्भर बनें और खुद के लिए खड़ी हों।

सोशल मीडिया पर बहस

वायरल वीडियो पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। कुछ यूजर्स ने इसे “मूर्खता या पागलपन” कहा, तो किसी ने लिखा “UPSC क्लियर हो गया लगता है।” वहीं बड़ी संख्या में लोगों ने पिता की इस हिम्मत की जमकर तारीफ की। भारत में हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले वायरल हुए हैं जहाँ पिताओं ने अपनी बेटियों को प्रताड़ना भरी शादी से निकालकर धूमधाम से घर वापस लाया। ये “रिवर्स बारात” अब एक नई सामाजिक सोच की पहचान बनती जा रही है। यह घटना समाज की उस पुरानी सोच पर करारा प्रहार है जो कहती है — “बेटी की डोली जाती है तो अर्थी ही लौटती है।” मेरठ के इस जज पिता ने साबित किया कि असली हिम्मत बेटी को प्रताड़ना में झोंकना नहीं, बल्कि उसे गले लगाकर नई शुरुआत देना है।​​​​​​​​​​​​​​​​

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