वॉशिंगटन/द हेग, अमेरिका ने शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिए। यह कदम उस समय उठाया गया जब आईसीसी की पूर्व न्यायाधीश नवी पिल्लई (Navi Pillay) को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की घोषणा हुए सिर्फ कुछ घंटे ही बीते थे। ट्रंप प्रशासन का यह फैसला वैश्विक कूटनीतिक तनाव को और बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बयान में कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप कभी भी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय को अमेरिकियों पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देंगे। इसलिए आज अमेरिका आईसीसी पर प्रतिबंध लगा रहा है। हम इस ‘rogue court’ के साथ लेन-देन पर रोक लगाएंगे, जिससे उसके संसाधन कटेंगे और संचालन क्षमता कमजोर होगी।”
प्रतिबंधों के तहत अमेरिकी कंपनियों और नागरिकों को आईसीसी को सेवाएं, धन या सामान उपलब्ध कराने पर रोक लगाई गई है। हालांकि, रुबियो ने स्पष्ट किया कि ये प्रतिबंध इस तरह से तैयार किए गए हैं कि अदालत और उसके सदस्य देशों को अमेरिकी चिंताओं का समाधान करने का समय मिल सके। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग कुछ अस्थायी लाइसेंस भी जारी करेगा, ताकि अमेरिकी हित सुरक्षित रहें।
नोबेल पुरस्कार और आईसीसी का संबंध
नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने शुक्रवार को 85 वर्षीय दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद् नवी पिल्लई को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया। पिल्लई ने अंतरराष्ट्रीय कानून और शांति को बढ़ावा देने के लिए आजीवन काम किया है। वे 2003 से 2008 तक आईसीसी की अपील चैंबर में न्यायाधीश रह चुकी हैं। इसके अलावा वे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त और वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में न्यायाधीश हैं। उन्होंने गाजा में संयुक्त राष्ट्र की जांच समिति की अध्यक्षता भी की थी, जिसने इजरायल पर नरसंहार का आरोप लगाया था।
नोबेल समिति ने स्पष्ट कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून और न्यायिक संस्थानों पर बढ़ते हमलों के इस दौर में यह पुरस्कार एक महत्वपूर्ण संदेश है। समिति ने कहा, “हम कानून के ढांचे और न्याय के प्रति सम्मान में वैश्विक गिरावट देख रहे हैं। न्यायाधीश जो व्यवस्था और अराजकता के बीच सीमा की रक्षा करते हैं, आज स्वयं प्रतिबंधों का शिकार हो रहे हैं।” तोमोको अकाने ने पिल्लई की जीत को “विशेष महत्व” वाला बताया और कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था पर गहरा दबाव होने के समय यह सम्मान और भी मायने रखता है।
पृष्ठभूमि: ट्रंप प्रशासन और आईसीसी का टकराव
अमेरिका रोम संविधि का सदस्य नहीं है, जिसके तहत आईसीसी की स्थापना हुई थी। ट्रंप प्रशासन ने फरवरी 2025 में कार्यकारी आदेश जारी कर आईसीसी के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। इसका मुख्य कारण आईसीसी द्वारा इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करना तथा अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की जांच था।
इससे पहले प्रशासन ने आईसीसी के कई न्यायाधीशों, अभियोजकों और अधिकारियों पर व्यक्तिगत प्रतिबंध लगाए थे, जिनमें अदालत की अध्यक्ष तोमोको अकाने भी शामिल हैं। अब पूरे संगठन पर प्रतिबंध लगाकर ट्रंप प्रशासन ने इसे “ईंट-दर-ईंट” ध्वस्त करने की अपनी अभियान को और तेज कर दिया है। रुबियो ने पहले भी कहा था कि आईसीसी अमेरिकी संप्रभुता के लिए खतरा है। उन्होंने सहयोगी देशों से अदालत छोड़ने की अपील भी की है। कुछ अफ्रीकी और अन्य देश पहले ही सदस्यता छोड़ने की प्रक्रिया में हैं।
संभावित प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि ये प्रतिबंध आईसीसी की वित्तीय व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं, क्योंकि वैश्विक वित्तीय प्रणाली में डॉलर का दबदबा है। अदालत के लगभग 900 कर्मचारी विभिन्न देशों से हैं। यूरोपीय सहयोगी देश, जो आईसीसी के मजबूत समर्थक हैं, इस कदम से नाराज हो सकते हैं। नीदरलैंड में स्थित यह अदालत यूरोपीय संघ और नाटो सदस्य देशों से समर्थन पाती रही है।
अमेरिका का यह फैसला अंतरराष्ट्रीय कानून की व्यवस्था पर चल रहे व्यापक बहस को और तेज करेगा। एक तरफ ट्रंप प्रशासन संप्रभुता की रक्षा का दावा कर रहा है, तो दूसरी तरफ नोबेल समिति और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इसे अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था पर हमला बताया है।
यह भी पढ़ें: Gautam Budh Nagar Bar Association President Manoj Bhati License Cancelled, फर्जी डिग्री और हड़ताल मामले में बड़ी कार्रवाई

