मोदी का AI महाशक्ति बनाने का सपना vs स्थानीय विरोध

मुंबई/नई दिल्ली, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) युग की वैश्विक महाशक्ति बनाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं। उनका विजन है कि भारत “पूरी दुनिया का डेटा” होस्ट करे। लेकिन इस महत्वाकांक्षी योजना के सामने स्थानीय निवासियों का बढ़ता विरोध खड़ा हो गया है। मुंबई के पास ठाणे में अमेजन के विशाल डेटा सेंटर और आंध्र प्रदेश में गूगल के प्रोजेक्ट को लेकर लोग सड़कों पर उतर आए हैं। वे डर रहे हैं कि ये “ऊर्जा वैम्पायर” उनकी पानी और बिजली की आपूर्ति को चूस लेंगे।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ठाणे के एक अपार्टमेंट से इंजीनियर तुषार शेट्टी (46) ने देखा कि उनके घर के बाहर हरी-भरी जमीन अब लाल मिट्टी में बदल गई है। पेड़ काट दिए गए हैं ताकि अमेजन का डेटा सेंटर बन सके। यह प्रोजेक्ट अमेजन के भारत में 2030 तक 21 अरब डॉलर के AI इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश का हिस्सा है। शेट्टी कहते हैं, “अगर मुझे पता होता तो मैं यह घर कभी नहीं खरीदता।” उन्होंने पांच महीने पहले ही फ्लैट खरीदा था।

8 सितंबर को सैकड़ों निवासी, जिनमें बुजुर्ग भी शामिल थे, साइट के पास जमा हुए। उनके प्लेकार्ड पर लिखा था— “डेटा सेंटर्स ऊर्जा वैम्पायर हैं।” 62 वर्षीय वसुधा शेट्टी कहती हैं, “अगर डेटा सेंटर रुक गया तो हम रहेंगे… अगर आगे बढ़ा तो हम चले जाएंगे।” 68 वर्षीय विद्या कदम, जो 30 साल से इलाके में रह रही हैं, कहती हैं कि वे सड़कों पर उतरकर इसे रोकने के लिए कुछ भी करेंगी।

पानी और बिजली का संकट

भारत के पास दुनिया के सिर्फ 4 प्रतिशत मीठे पानी का हिस्सा है, जबकि आबादी 18 प्रतिशत है। डेटा सेंटर्स उन शहरों में लग रहे हैं जहां पहले से पानी की कमी है। एसएंडपी ग्लोबल का अनुमान है कि इस दशक में 60 से 80 प्रतिशत भारतीय डेटा सेंटर्स उच्च पानी तनाव का सामना करेंगे। 2025 में डेटा सेंटर्स ने लगभग 150 अरब लीटर पानी इस्तेमाल किया, जो 2030 तक दोगुना होने का अनुमान है।

अमेजन का दावा है कि ठाणे वाला सेंटर पानी-मुक्त कूलिंग सिस्टम इस्तेमाल करेगा, घरों की बिजली नहीं लेगा और शोर कम करने के उपाय करेगा। कंपनी कहती है कि काटे गए पेड़ों से ज्यादा पौधे लगाए गए हैं। स्थानीय अधिकारियों का भी समर्थन है। फिर भी निवासी कहते हैं कि उन्हें पर्याप्त परामर्श नहीं दिया गया।

आंध्र प्रदेश में गूगल का 15 अरब डॉलर का डेटा सेंटर प्रोजेक्ट भी विवादों में है। पर्यावरणविद वन्यजीव, पानी और बिजली की आपूर्ति को लेकर चिंतित हैं। कुछ जगहों पर मंदिर की जमीन के इस्तेमाल का आरोप भी लगा है, जिसे गूगल और राज्य सरकार खारिज करती हैं।

राजनीतिक और वैश्विक आयाम

विरोध सिर्फ स्थानीय नहीं रह गया। सितंबर में विपक्षी नेता आदित्य ठाकरे भी मुंबई प्रदर्शनकारियों के साथ जुड़ गए। उन्होंने कहा कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो प्रोजेक्ट कहीं और शिफ्ट करेंगे।

यह विरोध वैश्विक रुझान का हिस्सा है। वर्जीनिया, एम्स्टर्डम और डबलिन जैसे जगहों पर भी AI डेटा सेंटर्स के खिलाफ निवासी शोर, बिजली खपत और पानी के तनाव को लेकर विरोध कर रहे हैं। भारत में माइक्रोसॉफ्ट भी 20.5 अरब डॉलर का निवेश कर रही है, ज्यादातर AI डेटा सेंटर्स के लिए।

सरकार डेटा सेंटर्स को “भारत के डिजिटल जीवन के अदृश्य इंजन” बता रही है और कह रही है कि आधुनिक तकनीक पानी-बिजली का कुशल इस्तेमाल करती है। लेकिन उद्योग के कुछ विशेषज्ञ भी मानते हैं कि रिहायशी इलाकों के पास डेटा सेंटर नहीं लगाने चाहिए। सिफी इनफिनिट स्पेसेस के सीईओ शरद अग्रवाल कहते हैं, “मैं कभी रिहायशी क्षेत्र में डेटा सेंटर नहीं लगाऊंगा।”

क्या आगे?

मोदी सरकार भारत को AI का भौतिक बैकबोन बनाने पर दांव लगा रही है, क्योंकि फ्रंटियर मॉडल में अमेरिका और चीन के मुकाबले पीछे है। लेकिन पानी-बिजली जैसे सीमित संसाधनों और स्थानीय समुदायों की चिंताओं के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। प्रदर्शन जारी हैं और राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है।

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