पटना। बिहार के राजनीतिक इतिहास के सबसे रहस्यमयी मामलों में शुमार ‘बॉबी हत्याकांड’ की चर्चा आज भी होती है। यह मामला 1983 का है, जब बिहार विधानसभा सचिवालय में काम करने वाली एक युवती की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी।
कौन थी बॉबी?
बॉबी का असली नाम श्वेत निशा त्रिवेदी था। उन्हें 1978 में विधानसभा सचिवालय में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी मिली थी, जो बाद में टाइपिस्ट बन गई। वह दिखने में बेहद आकर्षक मानी जाती थीं और पटना के कई राजनेताओं से उनकी नजदीकी थी। मीडिया में उन्हें ‘बेबी’ से ‘बॉबी’ नाम इसलिए दिया गया क्योंकि उस दौर में राज कपूर की फिल्म ‘बॉबी’ युवाओं में खासी लोकप्रिय थी। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, वह कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और बिहार विधान परिषद की तत्कालीन सभापति राजेश्वरी सरोज दास की दत्तक पुत्री थीं।
रहस्यमयी मौत और जल्दबाजी में दफनाना
बॉबी यानी श्वेत निशा त्रिवेदी की रहस्यमयी मौत 7 मई 1983 को हुई थी। मौत के बाद महज चार घंटे के भीतर ही उनके शव को चुपचाप दफना दिया गया। अगर उस समय के प्रमुख अखबार ‘आज’ और ‘प्रदीप’ ने यह खबर न छापी होती, तो शायद यह मामला कभी सामने ही नहीं आता।
सियासी भूचाल
उस समय बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री थे। इस मामले ने राज्य की सियासत में हलचल मचा दी, क्योंकि इसमें कई बड़े नेताओं के नाम जुड़ने की चर्चा होने लगी।
सीबीआई जांच
भारी जनाक्रोश और मीडिया में मामला तूल पकड़ने के बाद मई 1983 में जगन्नाथ मिश्रा की सरकार ने इस केस को सीबीआई को सौंप दिया। हालांकि, राजनीतिक रसूख और पुख्ता सबूतों की कमी के चलते यह मामला आज तक अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सका और बिहार के इतिहास के सबसे रहस्यमयी अनसुलझे मामलों में गिना जाता है।
अब बनेगी फिल्म
इस चर्चित मामले को लेकर अब फिल्म बनाए जाने की भी खबरें सामने आई हैं, जिससे यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।
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