9 मौतों के बाद फिर उठे सवाल: दिल्ली से नोएडा होकर पूर्वांचल-बिहार जाने वाली स्लीपर बसों में यात्रियों की जान कितनी सुरक्षित?

नोएडा/ग्रेटर नोएडा: दिल्ली से नोएडा होते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार जाने वाली निजी स्लीपर बसों में यात्रियों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यमुना एक्सप्रेसवे पर 23 सितंबर की देर रात स्लीपर बस में आग लगने से 9 यात्रियों की मौत के बाद इन बसों के संचालन, फिटनेस, ओवरलोडिंग, आपातकालीन निकास और सामान ढोने की व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। हादसे के समय बस में करीब 30-35 यात्री सवार बताए गए हैं और कई यात्रियों ने खिड़कियों से कूदकर अपनी जान बचाई।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कार्रवाई केवल किसी बड़े हादसे के बाद ही होती है? दिल्ली से नोएडा और आगे पूर्वांचल-बिहार के लिए रोजाना चलने वाली कई निजी बसों की जांच को लेकर समय-समय पर अभियान जरूर चलाए जाते हैं, लेकिन परिवहन विभाग की अपनी कार्रवाई के आंकड़े बताते हैं कि नियमों का उल्लंघन करने वाली बसें सड़क पर मिलती रही हैं।

सिर्फ यात्री नहीं, बसों में ढोया जाता है भारी सामान भी

इन स्लीपर बसों में यात्रियों के साथ सामान की ढुलाई भी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आती रही है। मई 2026 में नोएडा परिवहन विभाग ने 61 स्लीपर एसी बसों को जब्त किया था। जांच में कुछ बसों में क्षमता से अधिक यात्री, छोटे आपातकालीन दरवाजे और पीछे की तरफ अवैध कैरियर लगे मिले थे। परिवहन विभाग के अनुसार कैरियर पर भारी सामान लोड किया जा रहा था और इससे दुर्घटना की स्थिति में पीछे से निकलने का रास्ता प्रभावित हो सकता था। इस अभियान में करीब 50 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। यह कार्रवाई अपने आप में सवाल खड़ा करती है कि यदि जांच के दौरान इतने बड़े पैमाने पर सुरक्षा संबंधी कमियां मिल रही हैं तो नियमित रूप से चलने वाली इन बसों की फिटनेस और सुरक्षा जांच कितनी प्रभावी है?

हादसे के बाद ही क्यों याद आता है नियमों का पालन?

स्लीपर बसों के मामले में अक्सर हादसे के बाद जांच और कार्रवाई तेज होती दिखाई देती है। जून 2026 में नोएडा में परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाकर छह दिनों में 76 डग्गामार और नियमों का उल्लंघन करने वाली बसों को सीज किया था। अभियान में ओवरलोडिंग और सुरक्षा मानकों की अनदेखी जैसे मामले सामने आए थे।

ऐसे अभियानों से यह तो स्पष्ट होता है कि विभाग को नियम तोड़ने वाली बसें मिलती हैं, लेकिन सवाल यह है कि ये बसें बार-बार सड़कों पर कैसे लौटती हैं और यात्रियों को लेकर लंबी दूरी की यात्रा कैसे करती हैं?

2025 में भी यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस बनी थी आग का गोला

यह पहला मामला नहीं है जब यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगी हो। अक्टूबर 2025 में भी यमुना एक्सप्रेसवे पर एक चलती स्लीपर बस में आग लग गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक बस की छत पर रखे सामान से आग लगने की बात सामने आई थी। बस में करीब 50 यात्री सवार थे और यात्रियों ने कूदकर अपनी जान बचाई थी। दमकल पहुंचने से पहले बस काफी हद तक जल चुकी थी।

वहीं नवंबर 2024 के आसपास छठ पर्व के दौरान नोएडा से आगरा जा रही यात्रियों से भरी स्लीपर कोच बस में भी यमुना एक्सप्रेसवे पर आग लग गई थी। उस घटना में बस में करीब 40 यात्री बताए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार इंजन से धुआं निकलने के बाद चालक ने बस रोक दी और सभी यात्री समय रहते बाहर निकल गए। इन घटनाओं को एक साथ देखने पर सवाल उठता है कि बस में सामान रखने की व्यवस्था, इंजन और इलेक्ट्रिकल सिस्टम की जांच तथा यात्रियों के आपातकालीन निकास की व्यवस्था को लेकर स्थायी समाधान क्यों नहीं दिखाई देता?

इस बार 9 लोगों की जान नहीं बच सकी

23 सितंबर की रात हुए हादसे ने पिछले मामलों की तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यमुना एक्सप्रेसवे पर करीब 33 किलोमीटर के पास स्लीपर बस में आग लगी। पुलिस के अनुसार बस दिल्ली से महोबा की तरफ जा रही थी और हादसे के समय ज्यादातर यात्री सो रहे थे। आग लगने के बाद कुछ यात्री खिड़कियों से बाहर निकलने में सफल रहे, लेकिन 9 यात्रियों की मौत हो गई।

पुलिस शिकायत से जुड़े विवरण में यह भी सामने आया है कि यात्रियों ने बस के ड्राइवर के केबिन की तरफ से जलने की गंध महसूस होने की बात कही थी और बस रोकने को कहा था। शिकायत में चालक और परिचालक पर यात्रियों की चेतावनी को गंभीरता से न लेने तथा धूम्रपान जारी रखने के आरोप लगाए गए हैं। ये आरोप जांच का विषय हैं।

आग के वास्तविक कारण की जांच पुलिस और संबंधित एजेंसियां कर रही हैं। कुछ रिपोर्टों में एसी सिस्टम से जुड़े संभावित तकनीकी कारण का उल्लेख है, जबकि अन्य रिपोर्टों में सामान और पटाखों जैसी आवाजों की बात सामने आई है। इसलिए अंतिम कारण जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।

सवाल सिर्फ बस संचालकों पर नहीं, निगरानी व्यवस्था पर भी

दिल्ली-नोएडा के रास्ते पूर्वांचल और बिहार जाने वाली बसों का नेटवर्क लंबा है। यात्रियों की संख्या अधिक होने के कारण इन बसों में सुरक्षा व्यवस्था का महत्व और बढ़ जाता है। ऐसे में केवल बस मालिक या चालक पर कार्रवाई करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।

सवाल यह भी है कि—

  • क्या हर स्लीपर बस की फिटनेस की नियमित और वास्तविक जांच होती है?
  • क्या बस में निर्धारित क्षमता से अधिक यात्री तो नहीं बैठाए जा रहे?
  • क्या आपातकालीन दरवाजे और खिड़कियां मानकों के अनुरूप हैं?
  • क्या बस की छत या पीछे लगे कैरियर में भारी सामान ले जाने की अनुमति है?
  • क्या सामान के साथ ज्वलनशील वस्तुओं की ढुलाई रोकने की प्रभावी व्यवस्था है?
  • क्या चालक और परिचालक को आपात स्थिति से निपटने की पर्याप्त ट्रेनिंग दी जाती है?
  • क्या लंबी दूरी की बसों में अग्निशमन यंत्र और अन्य सुरक्षा उपकरण वास्तव में काम करने की स्थिति में हैं?
  • और सबसे अहम—अगर परिवहन विभाग को जांच में खामियां मिलती हैं तो क्या उन बसों के संचालन पर स्थायी निगरानी होती है?

पुलिस और परिवहन विभाग के लिए भी चुनौती

हादसे के बाद बसों की चेकिंग तेज करना जरूरी कदम है, लेकिन यात्रियों की सुरक्षा के लिए निगरानी को केवल हादसे के बाद चलने वाले अभियान तक सीमित रखने के बजाय नियमित व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा।

मई और जून 2026 में हुई परिवहन विभाग की कार्रवाइयों में दर्जनों बसों में नियमों का उल्लंघन सामने आ चुका है। इसके बावजूद सितंबर में एक स्लीपर बस में आग लगने से 9 लोगों की मौत होना बताता है कि सिर्फ चालान और सीज करने की कार्रवाई से आगे बढ़कर बस संचालन की पूरी श्रृंखला की निगरानी पर ध्यान देने की जरूरत है।

9 मौतों के बाद सबसे बड़ा सवाल—क्या अगला हादसा रोकने की तैयारी होगी?

यमुना एक्सप्रेसवे का ताजा हादसा केवल एक बस में लगी आग की घटना नहीं है। यह लंबी दूरी की निजी स्लीपर बसों में यात्रियों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा का भी मौका है। पिछले वर्षों में आग लगने की घटनाएं सामने आती रही हैं और इस साल भी परिवहन विभाग की जांच में ओवरलोडिंग, छोटे आपातकालीन द्वार और अवैध कैरियर जैसी कमियां पकड़ी गईं। अब जरूरत इस बात की है कि इन घटनाओं और कार्रवाई से मिले अनुभव के आधार पर दिल्ली-नोएडा से पूर्वांचल और बिहार जाने वाली स्लीपर बसों की सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक जांच हो। क्योंकि हादसे के बाद बस को सीज करना आसान है, लेकिन हादसा होने से पहले बस की कमी पकड़कर यात्रियों की जान बचाना ही असली चुनौती है।

 

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