कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में 2021 बैच की भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी डॉ. बुशरा बानो का अचानक स्थानांतरण राजनीतिक और सोशल मीडिया पर विवाद का विषय बन गया है। खड़गपुर (पश्चिम मेदिनीपुर) में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (Additional SP) के पद पर तैनात डॉ. बानो को 14 सितंबर 2026 को राज्य सशस्त्र पुलिस (State Armed Police) की चौथी बटालियन में डिप्टी कमांडेंट के पद पर भेज दिया गया।
यह स्थानांतरण उस वीडियो के एक दिन बाद हुआ, जिसमें उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी करने वाले छात्रों को प्रेरित करते हुए अपनी यात्रा साझा की थी। वीडियो में उन्होंने ‘अस्सलामु अलैकुम’ से शुरुआत की, बीच में ‘इंशाअल्लाह’ का इस्तेमाल किया और ‘जजाकल्लाह’ के साथ समाप्त किया। कुछ दक्षिणपंथी संगठनों और सोशल मीडिया अकाउंट्स ने इस पर आपत्ति जताई कि उन्होंने ‘वंदे मातरम’ या ‘जय हिंद’ जैसे राष्ट्रीय अभिवादन का इस्तेमाल नहीं किया।
क्या था वीडियो और शिकायत?
डॉ. बुशरा बानो उत्तर प्रदेश के कन्नौज की रहने वाली हैं। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से पीएचडी की है और सऊदी अरब में शिक्षण का अनुभव रखने के बाद यूपीएससी की परीक्षा पास कर IPS बनीं। 13 सितंबर को जारी वीडियो में उन्होंने बताया कि सऊदी अरब से लौटने के बाद उन्होंने यूपीएससी की तैयारी शुरू की। शुरू में स्वयं अध्ययन किया, फिर AMU के रेसिडेंशियल कोचिंग एकेडमी (RCA) ने बहुत मदद की। उनका पुस्तकालय भी अच्छा है। उन्होंने कहा कि यह जानकारी दूसरों के लाभ के लिए साझा कर रही हैं।
हिंदू नेटवर्क फाउंडेशन की इकाई बताए जाने वाले संगठन ‘हिंदू लीगल फंड’ ने पश्चिम बंगाल के गृह सचिव को शिकायत दी। संगठन ने सोशल मीडिया पर लिखा, “उन्होंने अस्सलामु अलैकुम से शुरुआत की, इंशाअल्लाह का इस्तेमाल किया, जजाकल्लाह के साथ समाप्त किया और वंदे मातरम या जय हिंद का इस्तेमाल नहीं किया। भारतीय राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सेवारत अधिकारी को सार्वजनिक संचार में तटस्थता बनाए रखनी चाहिए और राष्ट्रीय अभिव्यक्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए। उचित समीक्षा और कार्रवाई की मांग।” कुछ अकाउंट्स ने इसे ‘यूपीएससी जिहाद’ जैसे शब्दों से जोड़कर आलोचना की।
सरकार का रुख और ट्रांसफर आदेश
पश्चिम बंगाल सरकार (भाजपा सरकार, मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी) ने 14 सितंबर को गृह एवं पहाड़ी मामलों के विभाग के पुलिस सेवा सेल के माध्यम से आदेश जारी किया। आदेश में इसे ‘सार्वजनिक हित’ में तुरंत प्रभाव से लागू किया गया। साथ ही दो पश्चिम बंगाल पुलिस सेवा (WBPS) अधिकारियों—पार्थ घोष और सुभेंदु मंडल—का भी स्थानांतरण हुआ। पार्थ घोष को खड़गपुर में अतिरिक्त एसपी बनाया गया, जबकि सुभेंदु मंडल को चंदननगर पुलिस कमीशनरेट में अतिरिक्त डीसी का प्रभार दिया गया। सरकारी सूत्रों और अधिकारियों का कहना है कि यह नियमित प्रशासनिक पुनर्गठन (minor administrative reshuffle) है। ट्रांसफर आदेश में वीडियो या शिकायत का कोई उल्लेख नहीं है। सरकार ने स्पष्ट रूप से इसे वीडियो से जोड़ने से इनकार किया है।
विपक्ष और आलोचना
तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने सरकार पर धार्मिक पूर्वाग्रह का आरोप लगाते हुए कहा, “जिस देश के प्रधानमंत्री ने नए संसद भवन का उद्घाटन सेंगोल और नंगे बदन साधुओं के साथ किया, वहां अस्सलामु अलैकुम और इंशाअल्लाह कहने पर मुस्लिम IPS अधिकारी का ट्रांसफर हास्यास्पद है। हम नफरत और कट्टरता से जहर घुले राष्ट्र बन गए हैं। ईश्वर भारत की रक्षा करे।” उन्होंने ‘वी आर विद यू, बुशरा’ भी लिखा।
कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने आईपीएस एसोसिएशन से ध्यान देने की अपील की और कहा कि सरकार ने उनके साथ खड़े होने के बजाय अगले दिन ही ट्रांसफर कर दिया। पूर्व क्रिकेटर और तेलंगाना मंत्री मोहम्मद अजारुद्दीन ने इसे चिंताजनक बताया और पूछा कि अभिवादन को निशाना बनाने से अल्पसंख्यकों को क्या संदेश जा रहा है।
कानूनी पहलू: आधिकारिक स्थिति
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसमें व्यक्तिगत धार्मिक अभिव्यक्ति शामिल है। अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 के तहत अधिकारी से राजनीतिक तटस्थता और आधिकारिक कर्तव्यों में निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है, लेकिन व्यक्तिगत क्षमता में धार्मिक अभिवादन या अभिव्यक्ति पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है, जब तक कि यह आधिकारिक कर्तव्यों को प्रभावित न करे, सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़े या नियम का उल्लंघन न हो।
इस मामले में कोई आधिकारिक जांच रिपोर्ट, कदाचार का निष्कर्ष या अनुशासनात्मक कार्रवाई का उल्लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। केवल एक शिकायत दर्ज की गई और ट्रांसफर हुआ। ट्रांसफर को प्रशासनिक निर्णय माना जाता है, जिसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन अभी तक कोई कानूनी प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि व्यक्तिगत वीडियो में सामान्य धार्मिक अभिवादन (जैसे अस्सलामु अलैकुम, जो शांति की कामना है) को आधिकारिक निष्पक्षता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता, जब तक कि संदर्भ आधिकारिक प्रचार या भेदभाव का न हो। कुछ टिप्पणीकारों ने इसकी तुलना उत्तर प्रदेश के अधिकारी अनुज चौधरी के मामले से की है, जहां धार्मिक टिप्पणियों के बावजूद पदोन्नति हुई थी। दोनों मामलों में एकरूपता के सवाल उठे हैं।
डॉ. बुशरा बानो ने अभी तक इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की है। विवाद ने एक बार फिर सरकारी अधिकारियों की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति, धार्मिक तटस्थता और प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। सरकार का रुख स्पष्ट है—यह नियमित प्रक्रिया है। विपक्ष इसे पूर्वाग्रह बता रहा है। आगे की स्थिति पर नजर बनी हुई है।
यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट के वकील ध्रुव कुमार का मानवता के नाम वैश्विक पत्र

