नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता ध्रुव कुमार ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 (नई दिल्ली) के अध्यक्ष एवं मेज़बान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा ब्रिक्स सदस्य एवं साझेदार देशों के राष्ट्राध्यक्षों, शासनाध्यक्षों और प्रतिनिधिमंडलों को संबोधित करते हुए एक विस्तृत खुला पत्र जारी किया है। पत्र में उन्होंने मानव चेतना के रूपांतरण, भेदभाव के उन्मूलन, मानवीय गरिमा, शांति, समावेशी विकास और अधिक न्यायसंगत वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के लिए वैश्विक आह्वान किया है।
पत्र का शीर्षक है—“मानवता को विश्वव्यापी रूप से मानवीय बनाएं” (Humanize Humanity Worldwide)। अधिवक्ता ध्रुव कुमार ने इसे 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली से जारी किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह अपील भू-राजनीति, अर्थव्यवस्था या सैन्य शक्ति से आगे बढ़कर स्वयं मानव चेतना के रूपांतरण की मांग करती है।
पत्र की मुख्य बातें
अधिवक्ता ध्रुव कुमार ने लिखा है कि विश्व के पास वैज्ञानिक ज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल प्रौद्योगिकी और आर्थिक संसाधन पर्याप्त मात्रा में हैं, फिर भी युद्ध, आतंकवाद, गरीबी, भूख, विस्थापन, नस्लीय पूर्वाग्रह, जाति-आधारित भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। इसलिए इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा प्रश्न केवल “मानवता कितनी शक्तिशाली बन सकती है” नहीं, बल्कि “मानवता कितनी मानवीय बन सकती है” होना चाहिए। पत्र में मनोदशा परिवर्तन (मानसिकता का रूपांतरण) और मानस परिवर्तन (मानव चेतना का रूपांतरण) की आवश्यकता पर बल दिया गया है। उन्होंने कहा कि यदि लोगों के मन में घृणा बनी रहेगी तो कोई भी अंतरराष्ट्रीय समझौता स्थायी सफलता नहीं दिला सकता। जन्म, जाति, नस्ल, धर्म, गरीबी या सामाजिक स्थिति के आधार पर गरिमा से वंचित करना किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की नैतिक महानता को चुनौती देता है।
प्रमुख प्रस्ताव
- इंटरैक्टिव मानवता पार्क: ब्रिक्स देशों और क्रमशः विश्वभर में इंटरैक्टिव मानवता पार्क तथा शांति एवं सामाजिक रूपांतरण केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव। इनमें आभासी वास्तविकता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल कथावाचन, मध्यस्थता केंद्र और शांति शिक्षा शामिल हो सकते हैं ताकि बच्चे और युवा भेदभाव के वास्तविक प्रभावों को भावनात्मक स्तर पर समझ सकें।
- जाति और रंग आधारित भेदभाव का अंत: पत्र में दलित, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, आदिवासी समुदाय, नस्लीय अल्पसंख्यक और विस्थापित आबादी के लिए विशेष संरक्षण, प्रतिनिधित्व और अवसर सुनिश्चित करने की बात कही गई है। अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि मानवीय गरिमा जन्म या किसी भी पहचान पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।
- मानवता प्रथम सिद्धांत: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, आर्थिक सहयोग, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, स्वास्थ्य, जलवायु कार्रवाई और संघर्ष समाधान में “मानवता प्रथम” को मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने का आह्वान।
- आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट प्रतिक्रिया: आतंकवाद के मूल्यांकन में दोहरे मापदंड न अपनाने और आतंकवादी वित्तपोषण, भर्ती नेटवर्क तथा सीमा-पार गतिविधियों की रोकथाम के लिए वैध तंत्र मजबूत करने की बात कही गई है। साथ ही, कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकार और विधिसम्मत प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए।
- आर्थिक सहयोग और डिजिटल अर्थव्यवस्था: एकल मुद्रा या संस्था पर अत्यधिक निर्भरता कम कर स्थानीय मुद्रा निपटान, डिजिटल वित्तीय अवसंरचना और जिम्मेदार ऋण व्यवस्था को बढ़ावा देने का सुझाव। प्रौद्योगिकी को लाभ से पहले लोगों की सेवा करनी चाहिए।
- शिक्षा, न्याय और शांति: शिक्षा में मानवीय गरिमा, शांति, मध्यस्थता और भेदभाव-विरोध को शामिल करने; न्याय तक पहुंच मजबूत करने; तथा संवाद और मध्यस्थता के माध्यम से शांति निर्माण को प्राथमिकता देने की सिफारिश।
कानूनी और आधिकारिक स्पष्टीकरण
अधिवक्ता ध्रुव कुमार भारत के सर्वोच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करते हैं। उन्होंने पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि यह एक नागरिक अपील है और किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता का सम्मान करती है। पत्र में प्रस्तावित पहलें (जैसे मानवता पार्क, युवा फेलोशिप या मानवीय गरिमा प्रभाव रूपरेखा) अंतरराष्ट्रीय सहयोग के स्वैच्छिक ढांचे के अंतर्गत हैं। इनमें किसी भी देश के आंतरिक कानूनों में हस्तक्षेप या बाध्यकारी प्रावधान का उल्लेख नहीं है। आतंकवाद विरोध और सैन्य सहयोग संबंधी सुझाव भी मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानून तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुरूप रखने की बात कही गई है। पत्र में संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, प्रभावी और जवाबदेह बनाने के लिए वैश्विक जन-दबाव (Global Humanity Pressure for Peace, Justice and Accountability) विकसित करने का भी आह्वान किया गया है। यह दबाव शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीकों से ही प्रस्तावित है।
ब्रिक्स और भारत की भूमिका
अधिवक्ता ने भारत के सभ्यतागत दर्शन “वसुधैव कुटुम्बकम्” को व्यावहारिक अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई में बदलने की बात कही है। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स केवल भू-राजनीतिक गुट न बने, बल्कि राष्ट्रों की सहयोगी सभ्यता का उदाहरण प्रस्तुत करे। भारत अपने लोकतांत्रिक अनुभव, तकनीकी क्षमता और बढ़ते प्रभाव के साथ विविध राष्ट्रों को बिना एकरूपता थोपे जोड़ने में रचनात्मक भूमिका निभा सकता है।
पत्र के अंत में मानवता घोषणा दी गई है जिसमें कहा गया है कि जन्म के आधार पर कोई मनुष्य हीन नहीं है, किसी समुदाय का पहचान के आधार पर बहिष्कार नहीं होना चाहिए और किसी भी विकास में मानवता पीछे नहीं छूटनी चाहिए। यह खुला पत्र ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 से पहले जारी किया गया है और इसमें 2026 के बाद के विश्व व्यवस्था को अधिक मानवीय, समान और शांतिपूर्ण बनाने का आह्वान है। यह समाचार अधिवक्ता ध्रुव कुमार द्वारा जारी खुले पत्र पर आधारित है। पत्र में दिए गए सभी नाम और पद आधिकारिक रूप से सही रखे गए हैं। कानूनी पहलुओं को पत्र की मूल भावना के अनुरूप स्पष्ट किया गया है कि यह एक नागरिक अपील है, बाध्यकारी कानूनी दस्तावेज नहीं।

