प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों और लोकसेवकों को सुरक्षा प्रदान करने वाले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के प्रावधानों के तहत एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए गौतमबुद्ध नगर के सरकारी सर्जन डॉ. राहुल वर्मा को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने एसीजेएम कोर्ट, गौतमबुद्ध नगर द्वारा डॉ. वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने डॉ. राहुल वर्मा की याचिका पर सुनाया।
क्या था मामला
गौतमबुद्ध नगर निवासी धीरेंद्र ने यथार्थ अस्पताल में अपनी पत्नी की लैप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टोमी सर्जरी में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया था। शिकायत के मुताबिक सर्जरी के बाद उनकी पत्नी के पेट में 10 मिमी की पथरी छूट गई थी, जिसे बाद में किसी अन्य अस्पताल में निकलवाना पड़ा। मामले की जांच के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने तीन सदस्यीय समिति बनाई थी, जिसमें डॉ. राहुल वर्मा भी सदस्य के रूप में शामिल थे। शिकायतकर्ता जांच रिपोर्ट से असंतुष्ट रहा और उसने अदालत का रुख किया, जिसके बाद एसीजेएम प्रथम ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया।
हाईकोर्ट ने क्यों दी राहत
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बीएनएसएस की धारा 175(4) लोकसेवकों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान विशेष सुरक्षा प्रदान करती है। इस प्रावधान के तहत किसी लोकसेवक के खिलाफ जांच का आदेश देने से पहले संबंधित वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट मांगना और आरोपी लोकसेवक का पक्ष सुनना अनिवार्य है। कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने डॉ. वर्मा से कोई स्पष्टीकरण मांगे बिना ही सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया था, जो कानूनी दृष्टि से उचित नहीं था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता केवल सीएमओ द्वारा गठित जांच समिति के सदस्य थे और उन्होंने अपने सरकारी दायित्वों का ही निर्वहन किया था। रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि वे मरीज के इलाज या सर्जरी में प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने ओम प्रकाश अंबेडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि निर्धारित प्रक्रिया की अनदेखी करते हुए किसी लोकसेवक पर मुकदमा चलाना उचित नहीं ठहराया जा सकता। इन तर्कों के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए डॉ. राहुल वर्मा के मामले में एसीजेएम कोर्ट के 12 अगस्त के आदेश और उससे संबंधित पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
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