Sikka Karmic Greens Society: सेक्टर-78 के हाउसिंग सोसाइटी में बिल्डर की सांठगांठ का आरोप, अधूरे विकास कार्यों के बीच एओए चुनाव पर उठे सवाल

Sikka Karmic Greens Society: नोएडा के सेक्टर-78 स्थित जीएच-1सी भूखंड पर बनी सिक्का कार्मिक ग्रीन्स हाउसिंग सोसायटी इन दिनों विवादों के घेरे में है। यहां फ्लैट खरीदार अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (एओए) के गठन को लेकर हो रही प्रक्रिया के विरोध में आंदोलनरत हो गए हैं। निवासियों का आरोप है कि सोसायटी में विकास कार्य अभी भी अधूरे हैं, जरूरी सरकारी अनापत्ति प्रमाण-पत्र लंबित हैं, इसके बावजूद बिल्डर की मिलीभगत से कुछ फ्लैट खरीदार जल्दबाजी में एओए चुनाव करा रहे हैं।

छह टावरों में से एक को अब तक नहीं मिला ओसी

सोसायटी निवासी नरेंद्र मलिक के अनुसार, यहां कुल छह टावर बने हुए हैं, जिनमें से एस्पायर टावर को नोएडा प्राधिकरण से अधिभोग प्रमाणपत्र (ऑक्युपेंसी सर्टिफिकेट-ओसी) अब तक जारी नहीं हुआ है। इसके अलावा अग्निशमन विभाग की अनापत्ति (फायर एनओसी), सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से जुड़ी स्वीकृति और पूर्णता प्रमाणपत्र (कंप्लीशन सर्टिफिकेट) जैसे कई अहम दस्तावेज भी लंबित बताए जा रहे हैं। निवासियों का यह भी कहना है कि पानी, बिजली सहित अन्य विभागों के करोड़ों रुपये के बिल और चालान बकाया पड़े हैं, जिनका भुगतान अभी बिल्डर की जिम्मेदारी है।

उप निबंधक गाजियाबाद को भेजी लिखित शिकायत

इस पूरे मामले को लेकर नरेंद्र मलिक ने उप निबंधक, गाजियाबाद को लिखित शिकायत भेजी है, जिसमें उन्होंने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शिकायत में उल्लेख है कि रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम यानी रेरा कानून 2016 की धारा 11(4)(e) के प्रावधानों के अनुसार जब तक प्रोजेक्ट को शत-प्रतिशत ओसी प्राप्त नहीं होती, तब तक एओए का गठन वैधानिक रूप से मान्य नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद सोसायटी में चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। शिकायत में यह आशंका भी जताई गई है कि यदि मौजूदा हालात में चुनाव करा दिए गए, तो फायर, एसटीपी और पानी से जुड़े करोड़ों रुपये के बकाया चालान और बिलों की पूरी जिम्मेदारी नवगठित एओए यानी सोसायटी के करीब 600 परिवारों के कंधों पर आ जाएगी, जबकि यह दायित्व मूल रूप से बिल्डर का है।

निवासियों की आशंका- बिल्डर बच निकलना चाहता है जिम्मेदारी से

आंदोलनरत निवासियों का कहना है कि जल्दबाजी में कराए जा रहे एओए चुनाव के पीछे मंशा यही है कि बिल्डर बचे हुए विकास कार्यों, बकाया भुगतानों और जरूरी एनओसी की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ ले और सोसायटी का प्रबंधन खरीदारों के हवाले कर आगे बढ़ जाए। उनका कहना है कि जब तक प्राधिकरण और संबंधित विभागों से सभी जरूरी स्वीकृतियां नहीं मिल जातीं और बकाया बिलों का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक एओए का गठन नहीं होना चाहिए। फिलहाल मामला उप निबंधक गाजियाबाद के समक्ष लंबित है और निवासी प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। सोसायटी में आगे क्या फैसला होता है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं। यह रिपोर्ट सोसायटी निवासियों की शिकायत और उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। बिल्डर पक्ष का जवाब आने पर उसे भी शामिल किया जाएगा।

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