भारत में पायलट संकट को दूर करने के लिए सिमुलेटर-आधारित नई पायलट लाइसेंस की सिफारिश, उड़ान घंटे घटाकर तेज होगी ट्रेनिंग

भारत के एविएशन सेक्टर में गहराते पायलट संकट को कम करने के लिए सरकार की एक उच्चस्तरीय समिति ने मल्टी-क्रू पायलट लाइसेंस (MPL) का प्रस्ताव दिया है। इस नई व्यवस्था में वास्तविक विमान पर उड़ान का समय घटाकर 100-120 घंटे कर दिया जाएगा, जबकि अधिकांश ट्रेनिंग उन्नत फ्लाइट सिमुलेटरों पर होगी। यह बदलाव न केवल ट्रेनिंग अवधि को छोटा करेगा बल्कि एयरलाइंस को जल्दी तैयार पायलट उपलब्ध कराएगा। रीयूटर की रिपोर्ट के अनुसार, 3 जून 2026 को तैयार 19 पृष्ठों के ड्राफ्ट रिपोर्ट में DGCA (डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन) के वरिष्ठ अधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति ने यह सिफारिश की है। समिति में इंडिगो, एयर इंडिया और फ्लाइट ट्रेनिंग संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे। प्रस्ताव पर एयरलाइंस से फीडबैक लिया जा रहा है, जिसके बाद अंतिम रिपोर्ट DGCA प्रमुख को सौंपी जाएगी।

मौजूदा संकट की गंभीरता

भारतीय एविएशन उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है। एयरलाइंस ने 1,700 से अधिक नए विमानों का ऑर्डर दिया है, जिसके कारण अगले दशक में लगभग 30,000 नए पायलटों की जरूरत पड़ेगी। वर्तमान में भारत में सक्रिय पायलटों की संख्या करीब 12,000 के आसपास है, जबकि सालाना केवल 1,600 नए कमर्शियल पायलट लाइसेंस जारी होते हैं। इंडिगो जैसी बड़ी एयरलाइन में प्रति नैरोबॉडी विमान केवल 7.6 पायलट हैं, जबकि वैश्विक औसत 10 के करीब है। नए DGCA फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिट (FDTL) नियमों के कारण पायलटों की जरूरत और बढ़ गई है। दिसंबर 2025 में इंडिगो को पायलट कमी के कारण हजारों उड़ानें रद्द करनी पड़ीं, जिस पर रिकॉर्ड 245 मिलियन डॉलर का जुर्माना भी लगाया गया। सीनियर पायलट रिटायर हो रहे हैं या बेहतर वेतन के लिए विदेशी एयरलाइंस में जा रहे हैं, जिससे संकट गहरा रहा है।

MPL प्रस्ताव की मुख्य विशेषताएं

घटाए गए उड़ान घंटे: मौजूदा CPL नियमों के तहत कम से कम 200 घंटे वास्तविक उड़ान जरूरी है। MPL में यह 100-120 घंटे (जिसमें कम से कम 20 घंटे सोलो) तक सीमित होगा। सिमुलेटर पर फोकस: बाकी ट्रेनिंग कमर्शियल जेट सिमुलेटरों पर होगी, जो इमरजेंसी और क्रिटिकल स्थितियों की बेहतर प्रैक्टिस देगा। लाभ: ट्रेनिंग समय कम होना, ऑपरेशनल रिस्क घटना और एयरलाइन-स्पेसिफिक ट्रेनिंग। इंडिगो ने अगस्त 2025 में ही इसका समर्थन किया था। अंतरराष्ट्रीय उदाहरण: ICAO द्वारा 2006 में शुरू किया गया MPL यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व के कई देशों में सफलतापूर्वक चल रहा है।

समिति का मानना है कि मजबूत नियामकीय निगरानी के साथ यह मैनपावर शॉर्टेज कम कर सकता है और ट्रेनिंग को अधिक संरचित बनाएगा।

चिंताएं और विरोध

फ्लाइट ट्रेनिंग ऑर्गेनाइजेशंस की एसोसिएशन ने चिंता जताई है कि वास्तविक विमान पर कम उड़ान से कैडेट्स के हैंड्स-ऑन स्किल्स और अनपेक्षित स्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो सकती है। उन्होंने न्यूनतम 150 घंटे वास्तविक उड़ान की मांग की है। ड्राफ्ट रिपोर्ट स्वयं स्वीकार करती है कि कुछ पायलटों में “weaker hands-on flying instincts” विकसित हो सकते हैं।

उद्योग की तैयारी

एयर इंडिया ने गुरुग्राम में एयरबस के साथ एडवांस्ड ट्रेनिंग सेंटर स्थापित किया है, जो 10 फुल फ्लाइट सिमुलेटरों से लैस है और अगले दशक में 5,000+ पायलट ट्रेन करेगा। Simaero जैसी कंपनियां भारत में 100 मिलियन डॉलर निवेश कर 5,000 पायलट ट्रेनिंग की योजना बना रही हैं। देश में स्वदेशी फ्लाइट सिमुलेटर विकास भी हो रहा है, जो आयातित यूनिट्स की लागत आधी कर देगा। विशेषज्ञों का कहना है कि MPL जैसी व्यवस्थाएं सुरक्षित ट्रेनिंग सुनिश्चित करते हुए विकास को गति दे सकती हैं, लेकिन सख्त निगरानी और गुणवत्ता बनाए रखना जरूरी होगा। DGCA की अंतिम मंजूरी के बाद यह प्रस्ताव भारतीय एविएशन के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यह कदम न केवल पायलट संकट को कम करेगा बल्कि युवाओं के लिए एविएशन करियर को अधिक आकर्षक और सुलभ बनाएगा। हालांकि, सुरक्षा को कभी समझौता नहीं होना चाहिए।

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