उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ी हलचल मच गई है। अखिलेश यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी ने 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक परामर्श फर्म इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के साथ अपना अनुबंध रद्द करने का फ़ैसला किया है।
क्यों टूटा गठजोड़?
I-PAC मुख्य रूप से उन सीटों पर काम कर रहा था जहाँ सपा पिछले चुनाव में कम अंतर से हारी थी। I-PAC की टीम के अधिकांश सदस्य उत्तर प्रदेश के बाहर से काम कर रहे थे। I-PAC पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भी पार्टियों की रणनीति बनाता रहा है, लेकिन इन दोनों राज्यों में उसकी सलाह पर चलने वाली पार्टियों का प्रदर्शन अपेक्षाओं से कमज़ोर रहा। यह घटनाक्रम I-PAC के निदेशक विनेश चंदेल की प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा गिरफ़्तारी के बाद सामने आया है, जो पश्चिम बंगाल में कोयला तस्करी मामले से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित है। हालाँकि 30 अप्रैल 2026 को दिल्ली कोर्ट ने चंदेल को ज़मानत दे दी।
बंगाल में TMC की करारी हार — I-PAC पर उठे सवाल
ED छापों के बाद I-PAC ने पश्चिम बंगाल में अपना काम काफ़ी सीमित कर लिया था। कई दफ़्तर या तो बंद हो गए या न्यूनतम स्टाफ़ के साथ चलते रहे। इससे TMC और I-PAC के बीच तनाव बढ़ता चला गया। बंगाल में BJP की ऐतिहासिक जीत ने I-PAC की साख पर गहरा असर डाला। तमिलनाडु में भी 23 अप्रैल 2026 को हुए विधानसभा चुनावों में पहली बार त्रिशंकु विधानसभा का नज़ारा देखने को मिला — नवोदित तमिलागा वेत्री कझगम (TVK) 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि DMK सिमटकर 59 सीटों पर आ गई।
सपा की नई रणनीति क्या होगी?
I-PAC की जगह ‘शो टाइम’ नाम की एक अन्य परामर्श फर्म सपा के चुनाव प्रचार का काम देखती रहेगी। सूत्रों के अनुसार, अखिलेश यादव I-PAC को लेकर शुरू से पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। फर्म ने पार्टी नेतृत्व के सामने एक प्रेज़ेंटेशन दी थी कथित तौर पर TMC के सुझाव पर — लेकिन बातचीत आगे नहीं बढ़ी और कोई औपचारिक अनुबंध नहीं हुआ।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
BJP: भाजपा प्रवक्ताओं ने इस फ़ैसले पर तंज कसते हुए कहा कि “जो पार्टी बंगाल और तमिलनाडु में हारी हो, उससे सपा उत्तर प्रदेश जीतने की उम्मीद कैसे रख सकती थी?” भाजपा ने इसे सपा की “भ्रमित नेतृत्व” की निशानी बताया।
BSP: बसपा सुप्रीमो मायावती के करीबी सूत्रों ने कहा कि “बाहरी एजेंसियों पर निर्भरता दर्शाती है कि सपा का ज़मीनी जनाधार खोखला हो गया है।”
कांग्रेस: कांग्रेस ने कहा कि “I-PAC की विदाई इस बात का संकेत है कि विपक्ष में रणनीतिक एकता का अभाव है।”
आम जनता की राय: लखनऊ, कानपुर और वाराणसी में आम मतदाताओं से बात करने पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ मिलीं। कई लोगों का मानना है कि “चुनाव जमीन पर जीते जाते हैं, दिल्ली की कंसल्टेंसी फर्मों से नहीं।” युवा मतदाताओं में I-PAC के जाने पर ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता दिखा — उनकी प्राथमिकता रोज़गार और महँगाई है।
आगे क्या?
2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव अब और दिलचस्प हो गए हैं। बंगाल में TMC और BJP के बीच हुई सीधी लड़ाई, तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा — और अब सपा का I-PAC से अलगाव — यह सब मिलकर देश की राजनीतिक परामर्श संस्कृति पर बड़े सवाल खड़े कर रहे हैं। क्या डेटा और तकनीक आधारित चुनावी रणनीतियाँ वाकई काम करती हैं, या ज़मीनी नेतृत्व ही असली ताकत है — यह बहस 2027 तक जारी रहेगी।

