“कठमुल्ला” कहने वाले जज रिटायर: इलाहाबाद हाईकोर्ट के विवादास्पद न्यायाधीश जस्टिस शेखर कुमार यादव बुधवार (15 अप्रैल 2026) को सेवानिवृत्त हो गए। उनके रिटायरमेंट के साथ ही उनके खिलाफ राज्यसभा में लंबित महाभियोग की प्रक्रिया स्वतः समाप्त हो गई, क्योंकि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार महाभियोग केवल पद पर रहते हुए बैठे न्यायाधीश के खिलाफ ही चलाया जा सकता है।
जस्टिस यादव दिसंबर 2024 में विश्व हिंदू परिषद (VHP) की लीगल सेल द्वारा प्रयागराज में आयोजित एक कार्यक्रम में दिए गए भाषण को लेकर सुर्खियों में आए थे। उस भाषण में उन्होंने यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) की वकालत करते हुए कहा था कि “देश बहुसंख्यक आबादी की इच्छा के अनुसार चलेगा” और मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों (बहुविवाह, ट्रिपल तलाक, पशु वध आदि) पर टिप्पणियां की थीं। विपक्षी दलों ने इन टिप्पणियों को “हेट स्पीच” और सांप्रदायिक बताया था।
महाभियोग की प्रक्रिया
दिसंबर 2024 में राज्यसभा में 50 से अधिक (करीब 54-55) विपक्षी सांसदों ने महाभियोग का नोटिस दिया था। हालांकि, पिछले डेढ़ साल से यह प्रस्ताव संसद की प्रक्रियागत अड़चनों के कारण लंबित पड़ा रहा और कोई औपचारिक कार्रवाई नहीं हो सकी। रिटायरमेंट के कारण अब यह मामला पूरी तरह खत्म हो गया है।
रिटायरमेंट के अवसर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में आयोजित फुल कोर्ट रेफरेंस में जस्टिस यादव ने अपने बयानों का बचाव करते हुए कहा: “जिन लोगों ने मेरे बयान को तोड़ा-मरोड़ा, गलती उनकी है, मेरी नहीं।” “कोई भी यह नहीं कह सकता कि मैंने न्याय करते समय भेदभाव किया। मैंने कभी छोटे-बड़े वकीलों या किसी जाति/धर्म के आधार पर अंतर नहीं किया।” उन्होंने वकीलों का आभार जताया और कहा कि कठिन परिस्थितियों में उनका समर्थन मिला, वरना वे टूट जाते। जस्टिस यादव ने यह भी जोड़ा कि जज को हमेशा विनम्र रहना चाहिए, चाहे वह सीनियर हो या जूनियर।
पृष्ठभूमि और प्रतिक्रियाएं
विपक्ष: कांग्रेस, सपा और अन्य दलों ने जस्टिस यादव के बयानों को मुस्लिम-विरोधी करार दिया था और महाभियोग की मांग की थी। कुछ संगठनों ने इसे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल बताया। समर्थन: कुछ दलों और संगठनों ने इसे UCC पर खुलकर बोलने का मामला माना। जस्टिस यादव 12 दिसंबर 2019 को अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में शपथ ले चुके थे और 26 मार्च 2021 को स्थायी न्यायाधीश बने थे। यह मामला न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया की धीमी गति और समय-सीमा की कमी पर भी सवाल उठा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि रिटायरमेंट से पहले प्रक्रिया पूरी न होने से न्यायिक जवाबदेही का मुद्दा उजागर हुआ है।

