महिलाओं के खतने की कुप्रथा: परंपरा के नाम पर छोटी-छोटी लड़कियों के साथ हो रहा शारीरिक और मानसिक अत्याचार भारत की सामाजिक व्यवस्था के लिए एक काला अध्याय बना हुआ है। महिलाओं के जननांगों का आंशिक या पूर्ण काटना, जिसे फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) या ‘खफ्स/खतना/खाफद’ कहा जाता है, मुख्य रूप से दाऊदी बोहरा और सुलेमानी बोहरा समुदायों में प्रचलित है। संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, यह प्रक्रिया लड़कियों के बाहरी जननांगों को काटने या नुकसान पहुंचाने का रूप है, जिसमें कोई चिकित्सकीय लाभ नहीं है, बल्कि केवल हानि ही होती है।
यह दर्दनाक प्रथा अक्सर 6 से 7 साल की नन्ही बच्चियों पर बिना किसी बेहोश करने वाली दवा (एनेस्थीसिया) के ब्लेड या चाकू से की जाती है। बच्ची के लिए यह न सिर्फ गंभीर शारीरिक दर्द, संक्रमण, रक्तस्राव और बाद में यौन संबंधी समस्याओं का कारण बनती है, बल्कि आजीवन मानसिक आघात (ट्रॉमा) भी छोड़ जाती है। WHO स्पष्ट रूप से कहता है कि FGM महिलाओं के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।
भारत में यह प्रथा मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु में बसे दाऊदी बोहरा समुदाय (लगभग 10-20 लाख लोग) में 75-85 प्रतिशत लड़कियों पर लागू होती है। कुछ रिपोर्टों में सुलेमानी बोहरा, अलवी बोहरा और केरल के कुछ सुन्नी समुदायों में भी छोटे पैमाने पर इसका उल्लेख किया जाता रहा है। समुदाय के कुछ सदस्य इसे धार्मिक कर्तव्य या ‘सुन्नत’ मानते हैं, जिससे लड़कियों की यौन इच्छाओं को नियंत्रित किया जा सके और उन्हें ‘पवित्र’ रखा जा सके। परंतु कई इस्लामी विद्वान और समुदाय के अंदर की महिलाएं इसे धार्मिक रूप से अनिवार्य नहीं मानतीं।
ताजा अपडेट: सुप्रीम कोर्ट में बड़ी सुनवाई शुरू
इस कुप्रथा के खिलाफ कानूनी लड़ाई अब नया मोड़ ले रही है। 2017 में वकील सुनीता तिवारी द्वारा दायर PIL के बाद सात साल की कानूनी अटकन के बाद 7 अप्रैल 2026 से सुप्रीम कोर्ट की नौ-जजों की संवैधानिक पीठ ने इस मामले की सुनवाई शुरू कर दी है। साथ ही नवंबर 2025 में NGO चेतना वेलफेयर सोसाइटी की याचिका पर कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था, जिसमें FGM को असंवैधानिक घोषित करने, विशेष कानून बनाने और मौजूदा आपराधिक कानूनों (जैसे POCSO एक्ट और IPC की धाराएं) के तहत सजा देने की मांग की गई है। फिलहाल भारत में FGM पर कोई स्पष्ट कानून नहीं है, जिससे लड़कियां असुरक्षित रह जाती हैं।
समुदाय के अंदर से ही विरोध की आवाजें तेज हो रही हैं। संगठन जैसे सहियो (Sahiyo) और वी स्पीक आउट (WeSpeakOut) ने सर्वे किए, जिनमें 80 प्रतिशत बोहरा महिलाओं ने बताया कि उन्होंने खतना करवाया था और अब इसे बंद करने की मांग कर रही हैं। कई survivor महिलाएं खुलकर अपनी कहानियां साझा कर रही हैं और इसे ‘कुप्रथा’ करार दे रही हैं।
हर साल 6 फरवरी को संयुक्त राष्ट्र ‘इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस फॉर FGM’ मनाता है। 2026 का थीम “Towards 2030: No End To FGM Without Sustained Commitment and Investment” है, जो 2030 तक इस प्रथा को पूरी तरह समाप्त करने के लिए निरंतर निवेश और प्रतिबद्धता पर जोर देता है। वैश्विक स्तर पर 23 करोड़ से ज्यादा महिलाएं और लड़कियां FGM की शिकार हैं, जिनमें एशिया में 8 करोड़ से ज्यादा मामले हैं।
क्या परंपरा के नाम पर बच्चियों के अधिकारों से खिलवाड़ सही है?
यह सवाल आज हर संवेदनशील नागरिक को परेशान करता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों, मानवाधिकार संगठनों और समुदाय की आंतरिक आवाजों का कहना है कि अब बदलाव की घड़ी आ चुकी है। परंपरा अगर बच्चों के शरीर और भविष्य को नुकसान पहुंचा रही है, तो उसे ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ का आवरण नहीं मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई से उम्मीद है कि देश को FGM पर स्पष्ट कानून मिलेगा और बोहरा समुदाय समेत पूरे समाज में जागरूकता बढ़ेगी। समाज को अब चुप्पी तोड़नी होगी। बच्चियों की पीड़ा को ‘परंपरा’ कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बदलाव की शुरुआत आज से ही होनी चाहिए – शिक्षा, जागरूकता और कानूनी कार्रवाई के जरिए।

