A unique confluence of literature and culture: हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक नई और प्रखर आवाज बनकर उभरीं लेखिका शालिनी सिंह की पहली पुस्तक “बेबाक हूँ, बेअदब नहीं“ का शनिवार को दिल्ली के 21 अशोक रोड पर भव्य विमोचन हुआ। यह आयोजन न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर भी लेखिका और उनकी कृति जबरदस्त रूप से ट्रेंड करती रही।
दिग्गज विभूतियों की गरिमामयी उपस्थिति
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिसमें राजनीति और साहित्य जगत की नामचीन हस्तियों ने शिरकत की। मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह मौजूद रहे। वहीं, विशिष्ट अतिथियों में शामिल थे:
कलराज मिश्र (राजस्थान के पूर्व राज्यपाल)
हरिओम पवार (सुप्रसिद्ध ओज कवि)
पद्मश्री सुनील जोगी
इन दिग्गज विभूतियों के कर-कमलों द्वारा पुस्तक का विधिवत विमोचन किया गया। समारोह में उपस्थित संतों के सानिध्य ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक और पावन ऊर्जा से भर दिया।
“साहित्य देता है कठिन समय में संबल”: बृज भूषण शरण सिंह
एक पिता और मुख्य अतिथि के तौर पर भावुक होते हुए बृज भूषण शरण सिंह ने कहा, “आज मुझे गर्व है कि मुझे अपनी ही बेटी की रचना का विमोचन करने का सौभाग्य मिला है।” उन्होंने साहित्य की शक्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कविताएं व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में मानसिक मजबूती प्रदान करती हैं। उन्होंने युवाओं से साहित्य को जीवन का हिस्सा बनाने की अपील की।
लेखिका का संदेश: बेबाकी और मर्यादा का संतुलन
अपनी पहली कृति के बारे में बात करते हुए लेखिका शालिनी सिंह भावुक हो उठीं। उन्होंने पुस्तक के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट करते हुए कहा:
“यह पुस्तक मेरे वर्षों के संघर्षों और अनुभूतियों का दर्पण है। मेरा मानना है कि हमें अपनी बात पूरी ‘बेबाकी’ से कहनी चाहिए, लेकिन अपनी ‘मर्यादा’ और ‘संस्कारों’ की लक्ष्मण रेखा को कभी नहीं लांघना चाहिए। यदि यह पुस्तक किसी एक व्यक्ति को भी सच बोलने की प्रेरणा दे सकी, तो मेरा प्रयास सफल होगा।”
सोशल मीडिया पर छाया ‘बेबाक’ अंदाज
विमोचन के कुछ ही देर बाद शालिनी सिंह और उनकी पुस्तक की चर्चा डिजिटल दुनिया में तेज हो गई। ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर पाठकों और समर्थकों के भारी उत्साह के कारण पुस्तक का नाम टॉप ट्रेंड्स में शामिल रहा। आलोचकों और साहित्यकारों ने लेखिका की सराहना करते हुए कहा कि आज के दौर में ऐसी लेखनी की आवश्यकता है जो ज्वलंत मुद्दों पर बात तो करे, लेकिन भारतीय सभ्यता का दामन न छोड़े।
निष्कर्ष: कार्यक्रम के अंत में उपस्थित अतिथियों ने शालिनी सिंह के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। यह स्पष्ट है कि “बेबाक हूँ, बेअदब नहीं” अपनी वैचारिक गहराई के कारण हिंदी साहित्य जगत में एक लंबी लकीर खींचने के लिए तैयार है।

