मीटिंग में क्या हुआ?
डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन और ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्जफेल्ड्ट ने वेंस-रुबियो से बातचीत को “खुला और रचनात्मक” बताया, लेकिन स्पष्ट किया कि ट्रंप का ग्रीनलैंड को “अधिग्रहण” करने का इरादा “पूरी तरह अस्वीकार्य” है। रासमुसेन ने कहा कि बैठक में अमेरिकी सुरक्षा चिंताओं पर फोकस था, लेकिन रूस-चीन से “तत्काल खतरा” नहीं है और डेनमार्क इसे संभाल सकता है।
हालांकि, एक हाई-लेवल वर्किंग ग्रुप बनाया गया है, जो कुछ हफ्तों में पहली बैठक करेगा। इसका मकसद अमेरिकी सुरक्षा चिंताओं को दूर करना है, लेकिन डेनमार्क की “रेड लाइन्स” (संप्रभुता) का सम्मान करते हुए।

ट्रंप का रुख
ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा, “हमें ग्रीनलैंड राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चाहिए। गोल्डन डोम (मिसाइल डिफेंस शील्ड) प्रोजेक्ट के लिए भी जरूरी है। डेनमार्क इसे संभाल नहीं पाएगा, रूस-चीन आगे निकल जाएंगे।” उन्होंने मीटिंग पर ब्रिफिंग का इंतजार बताया और कहा कि “कुछ न कुछ हल निकल आएगा।” ट्रंप ने NATO छोड़ने की संभावना पर भी कुछ नहीं कहा, सिर्फ इतना बोले कि विकल्प खुले रखेंगे।
यूरोप और डेनमार्क का विरोध
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सेन ने पहले चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका बलप्रयोग करेगा तो NATO का अंत हो जाएगा। यूरोपीय देश एकजुट हो रहे हैं—कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि छह यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है। कोपेनहेगन में अमेरिकी दूतावास के बाहर “ग्रीनलैंड ग्रीनलैंडर्स का है” के नारे लगे प्रदर्शन हुए।
ग्रीनलैंड में अमेरिका का एक सैन्य बेस है, लेकिन डेनमार्क ने 6.5 बिलियन डॉलर का आर्कटिक डिफेंस पैकेज घोषित किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक सुरक्षा के लिए अहम है, लेकिन अमेरिका को ग्रीनलैंड की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए।
यह विवाद ट्रंप के पहले कार्यकाल से चला आ रहा है, जब उन्होंने ग्रीनलैंड खरीदने की कोशिश की थी। अब यह NATO और यूरोप-अमेरिका संबंधों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।

