CJI गाली घटना: सुप्रीम कोर्ट में CJI को गाली और पन्ने उछालने वाला प्रबल प्रताप यादव, परिवार का दावा- आर्थिक तंगी और तनाव में था, जांच में सामने आया ऑफिस में सहकर्मी को परेशान करने का आरोप

CJI गाली घटना: देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट में 10 जुलाई को हुई एक हैरान कर देने वाली घटना ने न्यायपालिका की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए। याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप यादव ने जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने न सिर्फ जजों को ‘मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट’ कहकर संबोधित किया, बल्कि उन्हें ‘आदेश’ देने की कोशिश की, 185 पन्नों की फाइल हवा में उछाल दी और मुख्य न्यायाधीश (CJI) के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गए, जिससे पूरे देश में चर्चा छिड़ गई। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, लेकिन प्रबल की ‘मानसिक स्थिति’ को देखते हुए अवमानना की कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की। बेंच ने सहानुभूति जताते हुए कहा कि वह ‘बहुत परेशान’ नजर आ रहा था।

प्रबल प्रताप यादव कौन हैं? परिवार का पक्ष

प्रबल प्रताप यादव उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के भरथना तहसील अंतर्गत नगला जयलाल भोली गांव के निवासी हैं। उनके पिता सुरेंद्र सिंह यादव एक साधारण किसान हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं बताई जाती। परिवार के अनुसार, बीएड पूरा करने के बाद सरकारी नौकरी न मिलने पर प्रबल लखनऊ चला गया। वहां लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई की। गुजारे के लिए ट्यूशन पढ़ाता था और एक निजी सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी भी करता था। परिवार का दावा है कि कंपनी में उसके साथ फ्रॉड हुआ, जिससे वह गहरे तनाव में चला गया। कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने के बावजूद उसे कहीं राहत नहीं मिली। पिता सुरेंद्र सिंह यादव ने बताया, “बेटा आर्थिक तंगी से बहुत परेशान था। स्वभाव से शांत था, कभी बदतमीजी नहीं करता था। हमें अंदाजा नहीं था कि वह दिल्ली जाकर ऐसा कुछ करेगा।” घटना से कुछ दिन पहले उनकी मां का आगरा में हार्ट ऑपरेशन हुआ था। प्रबल आगरा आया था और कहा था कि “अंतिम लड़ाई लड़ने सुप्रीम कोर्ट जा रहा हूं, वहां न्याय मिलेगा।” परिवार को वीडियो देखकर ही घटना की जानकारी मिली।

दूसरा पहलू: कंपनी में विवाद और ‘देशद्रोही’ आरोप

जांच और रिपोर्ट्स में एक अलग तस्वीर भी उभरी है। लखनऊ के विकास नगर स्थित सॉफ्टवेयर कंपनी में काम के दौरान प्रबल पर एक मुस्लिम सहकर्मी को परेशान करने और आपत्तिजनक ईमेल भेजने के आरोप लगे। कंपनी ने इन्हीं कारणों से उसे नौकरी से निकाल दिया। इसके बाद प्रबल ने कंपनी पर गंभीर आरोप लगाए, खुद को ‘कट्टर देशभक्त’ बताया और सहकर्मियों को ‘देशद्रोही’ करार दिया। उसने पुलिस में एफआईआर और अदालतों में याचिकाएं दायर कीं, लेकिन कहीं राहत नहीं मिली। इलाहाबाद हाईकोर्ट से निराश होकर वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां उसकी याचिका खारिज हो गई और उसने यह कांड किया।

कोर्ट का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने प्रबल की हरकत को गंभीर माना, लेकिन उसकी परेशानी को ध्यान में रखते हुए सहानुभूति दिखाई। बेंच ने कहा, “हम सहानुभूति रखते हैं।” याचिका मेरिट पर खारिज हुई, लेकिन अवमानना की कोई आगे की कार्रवाई नहीं हुई। यह घटना न्याय व्यवस्था में बढ़ते तनाव और फ्रस्ट्रेशन की ओर इशारा करती है। प्रबल प्रताप यादव का मामला व्यक्तिगत निराशा, आर्थिक संकट और कानूनी लड़ाई का एक दुखद उदाहरण बन गया है। परिवार अब उससे संपर्क नहीं हो पाने की चिंता जता रहा है। घटना की जांच जारी है। अधिक जानकारी के लिए आधिकारिक अदालती आदेश देखें।

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