शिपिंग पर लगा ‘युद्ध सरचार्ज’
शिपिंग कंपनियों ने पश्चिम एशिया से गुजरने वाले मालवाहक पोतों पर आपात संघर्ष अधिभार लगाना शुरू कर दिया है। फ्रांस की बड़ी कंटेनर कंपनी सीएमए सीजीएम प्रति कंटेनर 2,000 से 4,000 डॉलर के बीच यह सरचार्ज वसूल रही है। यानी हर कंटेनर पर डेढ़ से तीन लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ।
यूपी के निर्यातकों पर सीधा असर
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब उत्तर प्रदेश के निर्यातकों पर भी दिखने लगा है। राज्य का सालाना कुल निर्यात लगभग 1.86 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें खाड़ी देशों की हिस्सेदारी सीमित लेकिन अहम है। यूएई यूपी का सबसे बड़ा खाड़ी बाजार है, जहाँ सालाना 5,000 से 6,000 करोड़ रुपये का माल जाता है। लेदर उद्योग (कानपुर-उन्नाव), कृषि व खाद्य प्रसंस्करण और MSME निर्यातकों पर सबसे अधिक मार पड़ रही है। शिपिंग बीमा और मालभाड़ा बढ़ने से इनके मार्जिन में तेज़ गिरावट आ रही है।
होर्मुज़ बंद — 15-20 दिन की देरी
भारतीय निर्यातक संगठनों के महासंघ के अध्यक्ष एस.सी. रल्हन ने चेताया है कि यदि जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे से होकर लंबा रास्ता अपनाना पड़ा, तो यूरोप और अमेरिका पहुँचने वाले माल को 15 से 20 दिन अतिरिक्त लग सकते हैं। होर्मुज़ स्ट्रेट से वैश्विक तेल उत्पादन का 20.5 प्रतिशत और वैश्विक LNG व्यापार का 22 प्रतिशत गुजरता है। ईरान ने फरवरी 2026 में इस जलडमरूमध्य में लाइव-फायर सैन्य अभ्यास किया था।
कपड़ा और MSME सेक्टर सबसे ज़्यादा प्रभावित
ट्राइटन लॉजिस्टिक्स के सीईओ जितेंद्र श्रीवास्तव के मुताबिक कपड़ा निर्यातक बेहद सीमित मूल्य संरचना पर काम करते हैं। लॉजिस्टिक्स लागत में मामूली वृद्धि भी उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर कर सकती है। क्रिसिल रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का 30-35 प्रतिशत बासमती चावल और 80-90 प्रतिशत समुद्री उत्पाद इसी समुद्री कॉरिडोर से निर्यात होता है। जल्दी खराब होने वाले इन उत्पादों के निर्यातक बढ़ी हुई मालभाड़ा लागत का बोझ नहीं उठा पाते।
सरकार हरकत में
वाणिज्य मंत्रालय ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एक अहम बैठक बुलाई है, जिसमें निर्यातक संगठनों, शिपिंग कंपनियों और विभिन्न मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हो रहे हैं।
आगे क्या?
जानकारों का कहना है कि यदि क्षेत्रीय हालात जल्दी सामान्य हो जाते हैं तो निर्यात पर असर सीमित रह सकता है, लेकिन लंबा तनाव रहने पर ऑर्डर में अस्थायी गिरावट, भुगतान में देरी और निर्यात लागत में वृद्धि हो सकती है। नोएडा के इलेक्ट्रॉनिक्स और बड़े निर्यातकों पर असर अपेक्षाकृत कम रहने का अनुमान है, लेकिन छोटे उद्यमियों की चिंता बढ़ती जा रही है।

