गुप्त पत्र में क्या खुलासा किया था दुबे ने?
सत्येंद्र दुबे बिहार के कोडरमा में गोल्डन क्वाड्रिलेटरल प्रोजेक्ट के सब-डिविजनल ऑफिसर के रूप में कार्यरत थे। परियोजना में ठेकेदारों द्वारा घटिया सामग्री का उपयोग, अनुबंधों में अनियमितताएं और करोड़ों रुपये की लूट का खेल चल रहा था।
दुबे ने नवंबर 2002 में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को एक गुप्त पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने इन भ्रष्टाचार के मामलों का विस्तार से जिक्र किया। पत्र में उन्होंने ठेकेदारों और अधिकारियों के नाम लिए, लेकिन अपनी पहचान गोपनीय रखने की गुजारिश की। दुर्भाग्यवश, PMO ने यह पत्र NHAI को फॉरवर्ड कर दिया, जहां से उनकी पहचान लीक हो गई। जांच में पता चला कि ठेकेदारों और माफिया के गठजोड़ ने उन्हें मौत की सजा सुनाई।
हत्या के बाद राजनीतिक तूफान
27 नवंबर 2003 की रात, गया में दुबे अपनी स्कूटर पर घर लौट रहे थे जब अज्ञात हमलावरों ने उन्हें गोली मार दी। उनकी लाश सुबह मिली। इस घटना ने पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया। विपक्षी दलों ने संसद में हंगामा किया, मीडिया ने इसे ‘भ्रष्टाचार की बलि’ करार दिया। तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवानी ने CBI जांच का आदेश दिया। जांच में सामने आया कि हत्या के पीछे ठेकेदार बालेंदु मिश्रा और मंटू तिवारी जैसे लोग थे, जिन्हें बाद में गिरफ्तार किया गया। 2010 में पटना हाईकोर्ट ने चार आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, लेकिन मुख्य साजिशकर्ता अभी भी फरार बताए जाते हैं।
व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट की मांग और दुबे का बलिदान
दुबे की मौत ने व्हिसलब्लोअरों (सूचना देने वालों) की सुरक्षा पर बहस छेड़ दी। IIT समुदाय, नागरिक समाज और मीडिया ने जोरदार अभियान चलाया। परिणामस्वरूप, 2004 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अंतरिम व्यवस्था की गई। अंततः 2014 में भारत में ‘व्हिसलब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट’ पारित हुआ, जो भ्रष्टाचार उजागर करने वालों को सुरक्षा और गोपनीयता प्रदान करता है। हालांकि, कानून की कमियां अभी भी बाकी हैं, लेकिन दुबे का बलिदान इसकी नींव बना।
यह कहानी सिर्फ एक हत्या की नहीं, बल्कि सत्ता के सामने सच्चाई बोलने की कीमत की है। सत्येंद्र दुबे जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि ईमानदारी की लड़ाई में बलिदान अपरिहार्य हो सकता है, लेकिन यह बदलाव लाता है।

