मौसम विभाग (आईएमडी) की ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस साल दिसंबर में पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) का असर कमजोर पड़ गया है, जिससे ठंडी हवाओं की आमद रुक सी गई है। इसके बजाय, दक्षिण-पश्चिम मानसून के अवशेष और ग्लोबल वार्मिंग के कारण दिन में सूरज की किरणें तेज हो रही हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि 2015 से 2025 तक वैश्विक तापमान में 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है, जिसने भारत में चरम मौसम घटनाओं को 30 गुना अधिक संभावित बना दिया है। एल नीनो प्रभाव और प्रदूषण की बढ़ती सतह ने इस अनियमितता को और गहरा दिया है, खासकर दिल्ली-एनसीआर और उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में जहां कोहरा तो सुबह छाया रहता है, लेकिन दोपहर तक हवा गर्म हो जाती है।
इस मौसम दोहराव का सबसे ज्यादा असर कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक महीने में बच्चों में ब्रोंकाइटिस और बुजुर्गों में हृदय संबंधी जटिलताओं के केस 25% तक बढ़ गए हैं। गर्मी और ठंड के अचानक बदलाव से इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है, जिससे वायरल संक्रमण आसानी से फैलते हैं। विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि सुबह-शाम गर्म कपड़े पहनें, दोपहर में धूप से बचें और हाइड्रेटेड रहें। येल यूनिवर्सिटी की एक स्टडी में पाया गया कि 71% भारतीयों ने चरम गर्मी की लहरों का सामना किया है, जो कृषि, जल आपूर्ति और स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है।
सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए ‘हीट एक्शन प्लान’ को मजबूत किया है, जिसमें स्कूलों में विशेष छुट्टियां और बुजुर्गों के लिए मुफ्त चिकित्सा शिविर शामिल हैं। हालांकि, लैंसेट स्टडी के अनुसार, क्लाइमेट चेंज ने 2024 की हीटवेव को एक-तिहाई बढ़ा दिया था, और 2025 में भी यही ट्रेंड जारी है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का आह्वान है कि पेड़ लगाओ अभियान और कार्बन उत्सर्जन कम करने पर तत्काल ध्यान दिया जाए, वरना आने वाले वर्षों में ऐसी अनियमितताएं और भयावह हो जाएंगी।
यह मौसम का खेल नहीं, बल्कि मानवजनित संकट है। अगर हम अब नहीं चेते, तो सर्दियां भी गर्मियों जैसी हो जाएंगी। रहें सतर्क, रहें स्वस्थ!

