हिंसा अब ‘कुल’ लगने लगी
ट्रेड एक्सपर्ट रमेश बाला का कहना है कि पैनडेमिक के बाद दर्शकों की आदतें बदल गई हैं। युवा पीढ़ी कोरियन ड्रामा, अमेरिकी एक्शन और स्लैशर जॉनर देखकर हिंसा से परिचित हो चुकी है। “आज का युवा स्क्रीन पर क्रूरता को कूल मानता है,” बाला कहते हैं। इसलिए फिल्ममेकर्स अब हिंसा को छिपाते नहीं, बल्कि उसे फिल्म की ईमानदारी का हिस्सा बताते हैं। ‘धुरंधर’ जैसे अंडरवर्ल्ड और टेररिज्म पर बनी फिल्म में क्रूरता जरूरी लगती है, लेकिन सवाल ये है कि कहीं ये जरूरत से ज्यादा तो नहीं हो रही?
‘टॉक्सिक’ पर सबसे ज्यादा बवाल
यश की ‘टॉक्सिक’ का टीजर सबसे ज्यादा विवादों में घिरा हुआ है। कब्रिस्तान में हिंसा, अंतरंगता के साथ आक्रामकता—ये इमेजेस देखकर कई लोग असहज हो गए। टीजर को महिला ऑब्जेक्टिफिकेशन और अत्यधिक हिंसा के लिए आलोचना मिली। कर्नाटक स्टेट विमेंस कमीशन तक बात पहुंची, जहां टीजर बैन करने की मांग हुई। निर्देशक गीतु मोहंदास ने इसे क्रिएटिव चॉइस बताया, जबकि अनुराग कश्यप ने बैकलैश को “कल्चरल हाइपोक्रिसी” करार दिया। प्रोड्यूसर गिरीश जौहर कहते हैं, “बुराई भी चर्चा लाती है, आखिर में नजरें तो मिल ही जाती हैं।”
रणवीर सिंह स्टारर ‘धुरंधर’ (निर्देशक आदित्य धर) के दोनों टीजर्स में भी खुली हिंसा दिखाई गई। जेसन शाह जैसे कलाकारों ने इसे “फिल्मों की मासूमियत खत्म करने” वाला बताया। पहले पार्ट के ट्रेलर पर ध्रुव राठी ने भी तीखी टिप्पणी की थी। हालांकि फिल्ममेकर्स का तर्क है कि कहानी में हिंसा कहानी का हिस्सा है। ‘धुरंधर 2’ का टीजर भी हाल ही में आया, जो 19 मार्च 2026 को ‘टॉक्सिक’ से भिड़ने वाला है।
‘अस्सी’ अलग लेकिन असहज करने वाली
तापसी पन्नू की ‘अस्सी’ का ट्रेलर यौन हिंसा की कड़वी हकीकत दिखा रहा है। यह कोर्टरूम ड्रामा उन केसों पर आधारित है जिन्हें समाज ‘अस्सी’ (तुच्छ) मानकर भुला देता है। ट्रेलर को “अर्जेंट वॉच” कहा गया है। यहां हिंसा शॉक के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दे को उजागर करने के लिए है।
दर्शक desensitised हो गए?
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भारतीय दर्शक अब हिंसा से कम प्रभावित होते हैं। सेंसर बोर्ड पहले सख्त था, अब ‘A’ सर्टिफिकेट आसानी से मिल जाता है। ‘एनिमल’ से ‘धुरंधर’ तक इमोशनल क्रुएल्टी से फिजिकल ब्रूटैलिटी का सफर तय हो चुका है। लेकिन दोनों एक्सपर्ट एक बात पर सहमत हैं—हिंसा अकेले नहीं चलती। उसे इमोशनल आधार चाहिए, वरना खाली लगती है।
शॉक जरूरी नहीं
रमेश बाला और गिरीश जौहर दोनों कहते हैं कि शॉक वैकल्पिक है। कॉमेडी-रोमांस जैसी जॉनर बिना हिंसा के चलती हैं। आज के ओवरस्टिमुलेटेड दौर में शॉक एक शॉर्टकट बन गया है, नियम नहीं। यह ट्रेंड सिनेमा को बहादुर बना रहा है या सिर्फ शोर मचा रहा है—ये फिल्में रिलीज होने पर तय करेंगी। फिलहाल टीजर्स अपना काम कर रहे हैं: चर्चा करवा रहे हैं।

