The rise and infighting of the Justice Party: सत्ता की पहली सीढ़ी और कोटा क्रांति 1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने ‘डायार्की’ व्यवस्था शुरू की, जिसमें ब्रिटिशों ने महत्वपूर्ण विभाग अपने पास रखे और भारतीयों को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मामलों की जिम्मेदारी दी। जहां उत्तर भारत में गांधी के असहयोग आंदोलन ने चुनाव बहिष्कार किया, वहीं जस्टिस पार्टी ने इसमें हिस्सा लिया और 1920 के चुनाव में मद्रास विधान परिषद में 98 में से 63 सीटें जीतकर पहली गैर-ब्राह्मण सरकार बनाई।
ए. सुब्बारायलु रेड्डियार के बाद पनागल के राजा (1921-26) ने सरकार चलाई। इस दौर की सबसे बड़ी उपलब्धि 1921-22 के सांप्रदायिक जीओ (कम्युनल जीओ) थे, जिन्होंने सरकारी नौकरियों में गैर-ब्राह्मणों के लिए आरक्षण की शुरुआत की—हर 12 पदों में 5 गैर-ब्राह्मण, 2 ब्राह्मण, 2 मुस्लिम, 2 एंग्लो-इंडियन/ईसाई और 1 दलित। यह आज के तमिलनाडु के 69% आरक्षण मॉडल की यह आधारशिला है।
सामाजिक सुधारों में 1921 का हिंदू धार्मिक एंडोमेंट एक्ट भी शामिल है, जिसने मंदिर प्रशासन को वंशानुगत ब्राह्मण नियंत्रण से निकालकर सरकारी बोर्ड के हवाले किया था। डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी ने 1929 में देवदासी प्रथा विरोधी कानून पारित करवाया, जो महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा था।
तेलुगु झुकाव और आंतरिक दरारें पार्टी की कमजोरी उसका ‘तेलुगु टिल्ट’ था। पनागल के राजा और बाद में बोब्बिली राजा जैसे तेलुगु नेता प्रमुख पदों पर रहे, जबकि तमिल नेता सी. नटेसा मुदलियार हाशिए पर रहे। पार्टी कुलीन जमींदारों और पेशेवरों की रही, जिसने दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों को दूर रखा। आंतरिक अहंकार और गुटबाजी ने इसे कमजोर किया। 1937 में कांग्रेस की लहर में पार्टी बुरी तरह हार गई।
वर्तमान में गूंजती विरासत जस्टिस पार्टी की विरासत आज भी तमिलनाडु की राजनीति में दिखती है। मंदिर प्रशासन और एचआरएंडसी बोर्ड आज भी विवादों में रहता है। कुछ दिन पहले मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को प्राचीन मंदिरों में निर्माण-जीर्णोद्धार के लिए हेरिटेज कमीशन बनाने का निर्देश दिया और तब तक सभी काम रोकने को कहा गया।
गवर्नर आरएन रवि और सीएम एमके स्टालिन के बीच जारी तनाव भी जस्टिस युग की याद दिलाता है, जब ब्रिटिश गवर्नर विधेयकों को वीटो करते थे। इस साल गवर्नर चौथी बार विधानसभा के अभिभाषण सत्र से वॉकआउट कर गए, जिसके बाद स्टालिन ने गवर्नर के अभिभाषण को खत्म करने की संवैधानिक चुनौती दी। गणतंत्र दिवस पर दोनों ने साथ झंडा फहराया, लेकिन शाम के राजभवन चाय समारोह का बहिष्कार कर राज्य सरकार ने दूरी बनाए रखी।
लेखक के अनुसार, जस्टिस पार्टी ने सामाजिक न्याय और आरक्षण की नींव रखी, लेकिन कुलीनता और फूट ने उसे खत्म कर दिया। यह द्रविड़ राजनीति का प्रारंभिक रूप था, जिसके बीज अगले चरण में पेरियार ने बोए।
2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ तमिलनाडु की क्षेत्रीय राजनीति महत्वपूर्ण बनती जा रही है, जहां राष्ट्रीय दल अभी भी संघर्ष कर रहे हैं।

