The controversy over “Four Stars of Destiny” continues: पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरावणे (रिटायर्ड) की आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर संसद में चले विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। किताब अभी तक अप्रकाशित है और रक्षा मंत्रालय की मंजूरी का इंतजार कर रही है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संसद परिसर में इसकी हार्डकॉपी दिखाकर सभी को हैरान कर दिया। सवाल उठ रहा है कि अप्रकाशित किताब की छपी कॉपी राहुल गांधी तक कैसे पहुंची?
लेखक से मिली किताब – कांग्रेस सूत्र
मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस पार्टी के सूत्रों ने बताया कि राहुल गांधी को यह किताब खुद लेखक जनरल नरावणे से मिली है। किताब दिखाने का मकसद यह साबित करना था कि किताब मौजूद है और इसके अंशों का जिक्र संसद में करना वैध है। शुरू में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किताब को ‘अस्तित्वहीन’ बताकर राहुल के हवाले को खारिज कर दिया था, जिसके बाद राहुल ने अगले दिन किताब लहराई।
एक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक संपादक ने मीडिया के शो में कहा, “राहुल गांधी को किताब लेखक से ही मिली थी, लेकिन इसे सार्वजनिक रूप से दिखाने या देने का इरादा नहीं था। संसद में बहस के दौरान स्थिति ऐसी बनी कि किताब दिखानी पड़ी।”
पेंगुइन ने छपी किताब, लेकिन वापस मंगवाई
किताब का प्रकाशन पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया कर रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रकाशक ने मंजूरी का इंतजार किए बिना कुछ एडवांस कॉपियां छापीं और दिल्ली की कुछ बुकस्टोर्स तक पहुंचा दीं। प्री-ऑर्डर भी लिए गए थे, लेकिन विवाद के बाद सभी कॉपियां वापस मंगा ली गईं। अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसी साइट्स से किताब की लिस्टिंग हटा दी गई। कुछ किताबें रिव्यू के लिए भी भेजी गई थीं, जिनमें से एक राहुल तक पहुंची।
रक्षा मंत्रालय ने 2020 से 2024 तक 35 किताबों को मंजूरी दी, लेकिन नरावणे की यह किताब अकेली ऐसी है जो अब तक लंबित है। कारण बताए नहीं गए, लेकिन माना जा रहा है कि किताब में 2020 के लद्दाख विवाद, अग्निपथ स्कीम और नेतृत्व से जुड़े संवेदनशील मुद्दों का जिक्र किया गया है।
किताब में क्या विवादास्पद?
किताब में जनरल नरावणे ने अपनी चार दशक की सेवा, चीन से टकराव और सैन्य निर्णयों का जिक्र किया है। कारवां मैगजीन ने इसके अंश प्रकाशित किए थे, जिन्हें राहुल गांधी ने संसद में पढ़ने की कोशिश की। इनमें लद्दाख संकट के दौरान सरकार के रुख पर सवाल उठाए गए हैं। जनरल नरावणे ने अभी इस विवाद पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
पेंगुइन रैंडम हाउस और रक्षा मंत्रालय की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि किताब विदेश में उपलब्ध है, लेकिन भारत में प्रकाशन रोका जा रहा है – हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हुई।
यह विवाद राष्ट्रीय सुरक्षा, अभिव्यक्ति की आजादी और सैन्य किताबों की मंजूरी प्रक्रिया पर बड़ा सवाल उठा रहा है। किताब कब प्रकाशित होगी, यह अभी अनिश्चित है।

