मनोचिकित्सक डॉ. चांदनी तुगनैत (गेटवे ऑफ हीलिंग) कहती हैं, “सेक्स के दौरान ऑक्सीटोसिन और डोपामाइन हॉर्मोन रिलीज होते हैं, जो अटैचमेंट पैदा करते हैं। दिमाग कैजुअल रखना चाहता है, लेकिन शरीर बंधन बनाना चाहता है। इससे अकेलापन, खालीपन या बिना वजह रोना जैसी भावनाएं आ सकती हैं।”
हालिया रिसर्च के नतीजे:
• नवंबर 2025 में DW की रिपोर्ट: कई महिलाएं कैजुअल सेक्स से “बर्नआउट” महसूस कर रही हैं। भावनात्मक सीमाओं की अनदेखी से मानसिक थकान होती है।
• नवंबर 2025 में प्रकाशित स्टडी (Personal Relationships जर्नल): सिंगल्स में कैजुअल सेक्स करने वालों में सेक्सुअल सैटिस्फैक्शन ज्यादा, लेकिन अटैचमेंट अवॉइडेंस कम होने से इमोशनल रिस्क बढ़ता है।
• सितंबर 2025 में Verywell Mind: कैजुअल सेक्स से चिंता, उदासी और नेगेटिव मेंटल हेल्थ इफेक्ट्स का संबंध पाया गया।
• जुलाई 2025 की स्टडी: सेक्स के बाद कपल्स में ऑक्सीटोसिन लेवल सिंक्रोनाइज होता है, जो बंधन मजबूत करता है—कैजुअल एनकाउंटर्स में यह डिस्कनेक्ट पैदा कर सकता है।
डॉ. तृप्ति राहेजा (सीके बिड़ला हॉस्पिटल) कहती हैं, “कई लोग सेक्स को पछतावा नहीं करते, लेकिन बाद में खालीपन, कम आत्मसम्मान या चिंता महसूस करते हैं। डेटिंग ऐप्स ने इसे आसान बना दिया, लेकिन असली कनेक्शन दुर्लभ हो गया।”
भारत में यह बहस बढ़ रही है, जहां सोशल मीडिया पर थ्रिल को ग्लैमराइज किया जाता है, लेकिन आफ्टरमाथ पर चुप्पी रहती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि कैजुअल सेक्स हर किसी के लिए अलग प्रभाव डालता है—कुछ के लिए मजेदार, लेकिन कई के लिए भावनात्मक “कर्ज”। जेंडर डबल स्टैंडर्ड्स अभी भी बाकी हैं, जहां महिलाओं को ज्यादा जज किया जाता है।
विशेषज्ञों की सलाह
अपनी भावनाओं को सुनें, बाउंड्रीज सेट करें और जरूरत पड़े तो थेरेपी लें। स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ विकल्प नहीं, बल्कि खुद को समझना भी है।

