मध्य-पूर्व की राजनीति में पिछले कुछ महीनों में भूचाल आया हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर तेहरान पर दबाव बनाते आ रहे थे। इधर इज़राइल ने जून 2025 में ईरान पर एक बड़ा हमला किया था, जिसे “12 दिन का युद्ध” कहा गया। उस दौरान इज़राइल ने ईरान की सैन्य और परमाणु ठिकानों पर बमबारी की, कई बड़े सैन्य अधिकारियों और परमाणु वैज्ञानिकों को मार गिराया। उस समय सऊदी अरब ने अपनी ज़मीन और आसमान का इस्तेमाल हमले के लिए करने से साफ इनकार किया था और ईरान पर इज़राइली-अमेरिकी हमलों की सार्वजनिक निंदा की थी।
फिर फरवरी-मार्च 2026 में अमेरिका और इज़राइल ने एक बार फिर ईरान पर बड़े हमले शुरू किए। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई समेत कई शीर्ष नेता मारे गए। व्हाइट हाउस ने यह कदम उस वक्त उठाया जब उसके खाड़ी के सहयोगी खुद बार-बार इन हमलों के खिलाफ चेतावनी दे रहे थे और एक राजनयिक समझौता नज़दीक दिख रहा था।
सऊदी अरब का स्पष्ट संदेश
सऊदी अरब ने ईरान को सीधे सूचित किया कि वह किसी भी सैन्य कार्रवाई का हिस्सा नहीं बनेगा और उसकी ज़मीन या आसमान का इस्तेमाल इस उद्देश्य से नहीं होने दिया जाएगा। जनवरी में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान को फोन पर यही आश्वासन दिया। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमेरिकी मीडिया को बताया कि “सऊदी अरब किसी ऐसी जंग में अपना आसमान इस्तेमाल नहीं होने देगा, जिसका वह हिस्सा नहीं है।” यह वही रुख़ है जो सऊदी अरब ने इज़राइल और हूती विद्रोहियों के संदर्भ में भी अपनाया है। सऊदी अरब के साथ-साथ संयुक्त अरब अमीरात ने भी घोषणा की कि वह किसी भी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में सहयोग नहीं करेगा।
ईरान ने कहा — “शुक्रिया, सऊदी अरब”
सऊदी अरब के इस रुख़ को ईरान ने खुलकर सराहा। सऊदी अरब में ईरान के राजदूत अलीरज़ा एनायती ने कहा: “हम सऊदी अरब की उस बात की बार-बार तारीफ करते हैं जो हमने उनसे सुनी है — कि वे अपनी ज़मीन, अपने समुद्री क्षेत्र और अपने आसमान को इस्लामी गणराज्य ईरान के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देंगे।” यह बयान कूटनीतिक नज़रिए से बेहद अहम है — दो देश जो दशकों तक कट्टर दुश्मन रहे, आज एक-दूसरे का शुक्रिया अदा कर रहे हैं।
जनता का दबाव — असली वजह
खाड़ी देशों के इस रुख़ के पीछे सिर्फ सरकारी नीति नहीं, बल्कि उन देशों की जनता का भारी दबाव भी है। खाड़ी देशों ने इस युद्ध को रोकने के लिए हफ्तों, महीनों पहले से भरपूर कोशिश की थी।इस क्षेत्र में मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी, जो फिलिस्तीन और ईरान दोनों मामलों में अमेरिका-इज़राइल के रुख़ से नाराज़ है, अपनी सरकारों पर यह दबाव डाल रही थी कि वे इस जंग में किसी भी रूप में साझेदार न बनें। खाड़ी देशों ने एक ऐसी नीति बनाई थी जिसमें न तो अमेरिका का, न ही ईरान का खेमा चुना जाए — बल्कि लचीली कूटनीति के ज़रिए समस्या-समाधक की भूमिका निभाई जाए।
2023 से शुरू हुई थी दोस्ती की नई शुरुआत
2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान के बीच सात साल बाद राजनयिक संबंध बहाल हुए थे। तब से दोनों देशों ने कई व्यावहारिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया — हज यात्रा की व्यवस्था, व्यापार समझौते और सांस्कृतिक आदान-प्रदान। इस “डिटेंत” (सुलह) ने खाड़ी क्षेत्र में एक नई उम्मीद जगाई थी।
अब क्या है स्थिति?
हालांकि, स्थिति इस वक्त बेहद उलझी हुई है। ईरान ने उन्हीं खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए जिन्होंने अमेरिका को अपनी ज़मीन और आसमान देने से इनकार किया था। एक अरब राजनयिक ने कहा: “यह बेबुनियाद और गैर-ज़रूरी था। हमने उन्हें साफ बता दिया था कि हम अमेरिका या इज़राइल को अपनी ज़मीन इस्तेमाल नहीं करने देंगे।”
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ईरान के हमलों को “कायराना” करार देते हुए कहा कि “ईरान जानता था कि सऊदी आसमान का उपयोग उस पर हमले के लिए नहीं किया जा रहा था।” अब सऊदी अरब ने अपना रुख़ तटस्थता से बदलकर ईरान को “अस्तित्वगत खतरा” घोषित करते हुए सैन्य जवाब का अधिकार सुरक्षित रख लिया है।
इस प्राकर से निकाल सकते है समाधान
यह पूरा घटनाक्रम मध्य-पूर्व की राजनीति की जटिलता को उजागर करता है। सऊदी अरब ने जो कूटनीतिक साहस दिखाया — अमेरिका जैसी महाशक्ति को “नहीं” कहने का — वह न केवल उसकी अपनी जनता की आवाज़ थी, बल्कि एक स्वतंत्र विदेश नीति का संकेत भी। लेकिन ईरान के जवाबी हमलों ने इस सुलह को खतरे में डाल दिया है। खाड़ी देशों की सफलता का मॉडल — जो व्यापार, पर्यटन और निवेश पर टिका है — इस युद्ध से बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। दुनिया की नज़रें अब इस बात पर हैं कि क्या यह क्षेत्र शांति की ओर लौट पाएगा, या यह आग और भड़केगी
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