रमजानः बरकत, इबादत और आत्म-शुद्धि का पवित्र महीना, ये सब किया तो रोजा होगा मकरूह

Holy Month Of Ramadan: रमजान का मुबारक महीने आज से शुरू हो चुका है। यह महीना सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह खुद को संवारने, सब्र सीखने और दूसरों के प्रति हमदर्दी जताने का एक आध्यात्मिक सफर है। रमजान को बरकत, इबादत और आत्म-शुद्धि का पवित्र महीना भी कहा जाता है। इस्लामी कैलेंडर के नौवें महीने यानी रमजान-उल-मुबारक को इस्लाम में सबसे पवित्र माना गया है। यह वह समय है जब दुनिया भर के मुसलमान अपनी व्यस्त जिंदगी से ब्रेक लेकर खुदा की इबादत में खुद को समर्पित कर देते हैं। कुछ लोग ऐसे होते है जो रोजा रखा लेते है लेकिन उसके नियमों का पालन नही करते तो ऐसे लोगों का रोजा मकरूह माना जाता है।
इसका मतलब ये हुआ कि रोजा मकरूह (Makruh) होने का मतलब है कि रोजा वैध तो रहता है (टूटता नहीं है), लेकिन ऐसी हरकतें करना जिससे रोजे का रूहानी (आध्यात्मिक) असर कम हो जाए या रोजा ष्नापसंदीदाष् बन जाए। मकरूह रोजे में सवाब (पुण्य) बहुत कम हो जाता है, जैसे झूठ बोलना, चुगली करना, या बिना जरूरत खाने का स्वाद चखना।

कैसे पड़ी इस परंपरा की नींव? (इतिहास)

रमज़ान की शुरुआत का इतिहास आज से लगभग 1,400 साल पुराना है। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार:

  • कुरान का अवतरण: सन् 610 ईस्वी में, रमज़ान के महीने की एक रात (जिसे ‘लैलात-अल-कद्र’ कहा जाता है) को पैगंबर मोहम्मद साहब पर अल्लाह की पवित्र किताब ‘कुरान’ नाजिल (उतरना) होना शुरू हुई थी।
  • अनिवार्यता: मक्का से मदीना हिजरत (प्रवास) करने के दूसरे साल बाद मुसलमानों के लिए रमज़ान के रोज़े रखना अनिवार्य (फर्ज़) कर दिया गया।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य इंसान में ‘तक्वा’ (ईश्वर का भय और परहेजगारी) पैदा करना है, ताकि वह अनुशासन सीख सके और गरीबों की भूख का अहसास कर सके।

रमज़ान के दौरान क्या-क्या करना होता है?

रमज़ान का महीना नियमों और अनुशासन का एक बेहतरीन मेल है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं:

  1. रोज़ा (व्रत): सूरज निकलने से पहले (सेहरी) से लेकर सूरज डूबने (इफ्तार) तक कुछ भी खाने या पीने की मनाही होती है। यह केवल पेट का रोज़ा नहीं, बल्कि आँखों, कान और ज़बान का भी रोज़ा होता है—यानी बुरा न देखना, बुरा न सुनना और बुरा न बोलना।
  2. नमाज़ और तरावीह: रोज़ाना की पाँच वक्त की नमाज़ के अलावा, रात के समय एक विशेष नमाज़ पढ़ी जाती है जिसे ‘तरावीह’ कहते हैं। इसमें पूरे कुरान का पाठ सुना जाता है।
  3. ज़कात और सदका (दान): इस महीने में दान का महत्व 70 गुना बढ़ जाता है। लोग अपनी संपत्ति का एक हिस्सा (2.5%) गरीबों को देते हैं ताकि वे भी ईद की खुशियों में शामिल हो सकें।
  4. एतकाफ: रमज़ान के आखिरी 10 दिनों में कई लोग मस्जिद में एकांतवास (एतकाफ) करते हैं, जहाँ वे बाहरी दुनिया से कटकर सिर्फ इबादत करते हैं।

परंपरा का पालन करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

क्या करें (Dos) क्या न करें (Don’ts)
समय पर सेहरी और इफ्तार करें। झूठ बोलना, चुगली करना या गुस्सा करना।
ज्यादा से ज्यादा कुरान की तिलावत करें। जानबूझकर पानी पीना या कुछ खाना।
जरूरतमंदों की मदद और सेवा करें। लड़ाई-झगड़ा और गाली-गलौज से बचना।

एक ज़रूरी बात: रमज़ान का असली संदेश खुद को भीतर से बदलना है। अगर कोई इंसान भूखा रहता है लेकिन उसके व्यवहार में नरमी नहीं आती, तो वह रोज़े की रूह (आत्मा) को नहीं पा सकता।

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