ईरान में एक बार फिर बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी, राजनीतिक पाबंदियों और व्यक्तिगत आजादी को लेकर जनता का गुस्सा सड़कों पर साफ नजर आ रहा है। राजधानी तेहरान समेत कई प्रमुख शहरों में लोग सरकार और सर्वोच्च सत्ता ढांचे के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि शासन व्यवस्था में सुधार हो, अभिव्यक्ति की आजादी मिले और आर्थिक हालात बेहतर किए जाएं। सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच कई जगह टकराव की खबरें भी सामने आई हैं, जिसके बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए हैं।
ईरान में विरोध-प्रदर्शन
ईरान में विरोध-प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर जनता कई बार सड़कों पर उतर चुकी है। हालांकि सरकार इन आंदोलनों को दबाने की कोशिश करती रही है, लेकिन बार-बार उभरता असंतोष यह संकेत देता है कि देश के भीतर राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी ईरान की स्थिति पर नजर बनाए हुए है, क्योंकि यहां की अस्थिरता का असर पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र पर पड़ सकता है।
इन देशों में हुए तख्तापलट
यदि वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो बीते दशकों में कई देशों में तख्तापलट हो चुके हैं। एशिया में नेपल, श्रीलंका, बाग्लादेश, पाकिस्तान में 1958, 1977 और 1999 में सैन्य तख्तापलट हुए, जबकि अफगानिस्तान में 1973 और बाद के वर्षों में सत्ता परिवर्तन हिंसक तरीके से हुआ। मध्य-पूर्व में इराक (1968 और 2003), लीबिया (2011) और मिस्र (2013) में सत्ता परिवर्तन या तख्तापलट देखने को मिले। अफ्रीका महाद्वीप में भी माली, बुर्किना फासो, नाइजर, सूडान और गिनी जैसे देशों में हाल के वर्षों में सैन्य तख्तापलट हुए हैं। लैटिन अमेरिका में भी चिली (1973), अर्जेंटीना (1976) और बोलिविया (2019) जैसे देशों में लोकतांत्रिक सरकारों को गिराकर सत्ता बदली गई। इन सभी उदाहरणों से साफ है कि जब किसी देश में राजनीतिक असंतोष, आर्थिक संकट और जनता का भरोसा शासन से उठ जाता है, तो तख्तापलट या बड़े सत्ता परिवर्तन की संभावना बढ़ जाती है। ईरान में मौजूदा प्रदर्शन इसी वैश्विक पृष्ठभूमि में देखे जा रहे हैं, जहां जनता की नाराजगी भविष्य की राजनीति की दिशा तय कर सकती है।

