लद्दाख के GEN जेड आंदोलन में लोगो की मौत, कर्फ्यू और भारी सुरक्षा तैनात सुलझा नहीं अभी विवाद

People died in Ladakh’s Gen Z agitation: लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की लंबे समय से चली आ रही मांगों को लेकर बुधवार को लेह में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हिंसक रूप धारण कर लिया। पथराव, आगजनी और पुलिस फायरिंग में चार प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई, जबकि 70 से अधिक लोग घायल हुए हैं। जिला प्रशासन ने सुरक्षा के मद्देनजर लेह और कारगिल में कर्फ्यू लगा दिया है, साथ ही इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गई हैं। यह घटना लद्दाख के इतिहास की सबसे खूनी घटना के रूप में दर्ज हो गई है, जहां युवाओं का गुस्सा बेरोजगारी, भूमि अधिकारों और पहचान संकट पर फूट पड़ा।

प्रदर्शन की शुरुआत सोनम वांगचुक के नेतृत्व में 10 सितंबर से चल रहे 35 दिनों के अनशन से हुई, जो 24 सितंबर को लेह एपेक्स बॉडी (LAB) के युवा विंग द्वारा बुलाए गए बंद में तब्दील हो गया। सैकड़ों युवा, जिसमें स्कूली छात्र भी शामिल थे, शहीद स्मारक पार्क से सरकारी भवनों और भाजपा कार्यालय तक मार्च निकाल रहे थे। गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने भाजपा कार्यालय में आग लगा दी, सीआरपीएफ वाहनों को नुकसान पहुंचाया और स्थानीय हिल काउंसिल को आग के हवाले कर दिया। पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और अंत में गोली चलाने का सहारा लिया, जिससे हिंसा दोपहर 11:30 बजे शुरू होकर शाम 4 बजे तक चली।

लद्दाख एपेक्स बॉडी के समन्वयक जिग्मेट पलजोर ने इसे “लद्दाख के इतिहास का सबसे खूनी दिन” करार दिया। उन्होंने कहा, “हमारे युवाओं को शहीद कर दिया गया। लोग सरकार की झूठी वादों से तंग आ चुके थे।” वहीं, जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जिनका 15 दिनों का अनशन हिंसा के बीच टूट गया, ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए युवाओं से शांति बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा, “यह युवाओं का फूटा गुस्सा था, एक तरह की जेन-जेड क्रांति। बेरोजगारी (26.5% स्नातकों में) और लोकतांत्रिक अधिकारों की कमी सामाजिक अशांति की जड़ है।” वांगचुक ने जोर देकर कहा कि उन्होंने कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया।

सवालों का दौर
कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के कानूनी सलाहकार हाजी गुलाम मुस्तफा ने पुलिस फायरिंग पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “समझ नहीं आता कि गोली चलाने का आदेश किसने दिया? लद्दाख हमेशा शांति और भाईचारे की धरती रहा है। हमें हिंसा से जोड़ना गलत है। जो भी जिम्मेदार है, उसे जवाबदेह बनाना चाहिए।” मुस्तफा ने जोर दिया कि पिछले पांच सालों के सभी आंदोलन गांधीवादी तरीके से चले हैं और आगे भी शांतिपूर्ण रहेंगे।

पूर्व जम्मू-कश्मीर डीजीपी एसपी वैद्य ने इसे “सुनियोजित साजिश” बताया। उन्होंने कहा, “भाजपा कार्यालय को निशाना बनाना, कांग्रेस का पथराव का समर्थन—यह राजनीतिक साजिश लगती है। युवाओं को गुमराह किया जा रहा है। बेरोजगारी जैसे मुद्दों को निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए सुलझाना चाहिए, न कि हिंसा से।” वहीं, लद्दाख के उपराज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने हिंसा को “बाहर से भड़काई गई साजिश” करार दिया। उन्होंने कहा, “जो लोग शांति भंग करने आए, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। अनशन लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन इसकी आड़ में हिंसा स्वीकार्य नहीं।” गुप्ता ने राजनीतिक दलों से शांति स्थापना में सहयोग की अपील की।

राजनीतिक विश्लेषक सिद्दीक वाहिद ने चेतावनी दी, “लद्दाख में हो रही घटना भयावह है। पिछले छह सालों में लद्दाखियों को अपनी पहचान पर खतरे का एहसास हो गया है। युवाओं का गुस्सा चिंताजनक है, क्योंकि वे अधीर हैं।”

सरकारी कदम और मौजूदा सुरक्षा
केंद्र सरकार ने हिंसा को “अनियंत्रित भीड़” का परिणाम बताया, जो वांगचुक के भड़काऊ बयानों से प्रेरित था। गृह मंत्रालय ने कहा कि हिंसा दोपहर 11:30 बजे भड़की और शाम 4 बजे नियंत्रित हो गई। मंत्रालय के अनुसार, लद्दाख के लिए पहले से मजबूत सुरक्षा प्रावधान हैं—85% आरक्षण केवल स्थानीय अनुसूचित जनजातियों के लिए, पांच आधिकारिक भाषाओं (अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, भोटी, पर्गी) का मान्यता, और महिलाओं के लिए हिल डेवलपमेंट काउंसिल में एक-तिहाई आरक्षण। भूमि मुद्दों पर समीक्षा चल रही है।

मंत्रालय ने बताया कि लेह एपेक्स बॉडी और KDA के साथ कई दौर की वार्ता हो चुकी है। 27 मई को हाई-पावर्ड कमिटी की बैठक में भर्ती विवाद सुलझा। अगली वार्ता 6 अक्टूबर को निर्धारित है, जहां संवैधानिक सुरक्षा और अलग प्रशासनिक-पुलिस सेवा पर चर्चा होगी। गृह मंत्री अमित शाह से लद्दाख प्रतिनिधिमंडल की सकारात्मक बैठक हुई। जुलाई में सरकारी नौकरियों के लिए पांच साल की आयु छूट की अधिसूचना जारी की गई। मंत्रालय ने कहा, “हम लद्दाख की आकांक्षाओं के लिए पर्याप्त संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं।”

छठी अनुसूची क्या है?
संविधान की छठी अनुसूची आदिवासी बहुल क्षेत्रों के लिए स्वायत्त शासन प्रदान करती है, जिसमें असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम शामिल हैं। यह स्थानीय निकायों, वैकल्पिक न्याय व्यवस्था और वित्तीय शक्तियों का प्रावधान करती है। 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बन गया, जिसके बाद स्थानीय लोग अपनी पहचान, रोजगार और भूमि सुरक्षा के लिए आंदोलनरत हैं।
प्रशासन ने कारगिल, जंस्कार, नुब्रा, द्रास, चांगथांग और लामायुरू में भारी सुरक्षा बल तैनात कर दिए हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत पांच या अधिक लोगों के जमावड़े पर रोक लगा दी गई है। साज्जाद हुसैन कारगिली जैसे स्थानीय नेताओं ने हिंसा की निंदा करते हुए निष्पक्ष जांच और तत्काल संवाद की मांग की है।

लद्दाख की यह घटना न केवल क्षेत्रीय असंतोष को उजागर करती है, बल्कि युवाओं की निराशा को भी। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र को मांगों पर गंभीरता से विचार करना होगा, वरना यह कश्मीर जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। स्थिति पर नजर रखी जा रही है।

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