उत्तराखंड के मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी! क्या वल्र्ड में दूसरे धर्म स्थलों पर ऐसा होता है, छिड़ी नई बहस

देहरादून। उत्तराखंड, जिसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है, हाल के दिनों में एक नई बहस का केंद्र बन गया है। राज्य के प्रमुख तीर्थ स्थलों और मंदिरों की देखरेख करने वाली विभिन्न मंदिर समितियों के बीच इस बात पर सहमति बनती दिख रही है कि हिंदू धार्मिक स्थलों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित किया जाए। चारधाम (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री) सहित कई स्थानीय मंदिर कमेटियों का तर्क है कि यह कदम धार्मिक पवित्रता और मर्यादा बनाए रखने के लिए आवश्यक है। हालाँकि, इस संभावित निर्णय ने वैश्विक स्तर पर धार्मिक स्थलों की पहुँच और समावेशिता को लेकर एक बड़ी चर्चा छेड़ दी है। जहाँ एक ओर परंपराओं की रक्षा की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर दुनिया भर की प्रसिद्ध मस्जिदों और चर्चों के उदाहरण दिए जा रहे हैं जहाँ धर्म की दीवारें पर्यटकों या दूसरे धर्मों के लोगों के लिए बाधा नहीं बनतीं।

मस्जिदों और चर्चों के वैश्विक उदाहरण, जहाँ धर्म की सीमाएं नहीं
दुनिया के कई सबसे पवित्र और प्रतिष्ठित धार्मिक स्थल अपनी वास्तुकला और आध्यात्मिकता को साझा करने के लिए सभी धर्मों के लोगों का स्वागत करते हैं। जिसमें मस्जिदें (इस्लामी जगत) इस्लाम के कई प्रमुख स्थलों पर गैर-मुसलमानों का प्रवेश न केवल वर्जित नहीं है, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित भी किया जाता है। शेख जायद ग्रैंड मस्जिद (अबू धाबी), यह दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है। यहाँ हर धर्म का व्यक्ति न केवल प्रवेश कर सकता है, बल्कि वहां की वास्तुकला को देखने के लिए निर्देशित टूर भी दिए जाते हैं। ब्लू मस्जिद (इस्तांबुल), तुर्की की यह प्रसिद्ध मस्जिद पर्यटकों के लिए खुली रहती है, बशर्ते वे मर्यादा और ड्रेस कोड का पालन करें। जामा मस्जिद (दिल्ली), भारत में भी जामा मस्जिद सभी धर्मों के लोगों के लिए खुली है, जो इसे साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बनाती है।
चर्च और कैथेड्रल (ईसाई जगत), ईसाई धर्म के प्रमुख स्थल अक्सर खुले द्वार की नीति का पालन करते हैं। सेंट पीटर्स बेसिलिका (वेटिकन सिटी), कैथोलिक ईसाइयों के लिए सबसे पवित्र स्थलों में से एक होने के बावजूद, यहाँ हर साल लाखों गैर-ईसाई पर्यटक बिना किसी धार्मिक भेदभाव के आते हैं। सेंट पॉल्स कैथेड्रल (लंदन) और नोट्रे-डेम (पेरिस), ये स्थल प्रार्थना के साथ-साथ पर्यटन के लिए भी खुले हैं, जहाँ आने वाले की धार्मिक पहचान नहीं पूछी जाती।

विवाद का मुख्य केंद्र सुरक्षा बनाम समावेशिता
वहीं उत्तराखंड में मंदिर समितियों का दावा है कि मर्यादा और स्थानीय संस्कृति की रक्षा के लिए कुछ कड़े कदम उठाने जरूरी हैं। उनका तर्क है कि गैर-हिंदुओं का प्रवेश कभी-कभी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली गतिविधियों का कारण बनता है। समितियों के संभावित प्रस्ताव के मुख्य बिंदु में मंदिर परिसरों में प्रवेश से पहले पहचान पत्र की अनिवार्य जांच बनाया जाना है। धार्मिक स्थलों के आसपास गैर-हिंदुओं के व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर अंकुश। श्रद्धालुओं के लिए एक विशिष्ट ड्रेस कोड का सख्ती से पालन। मंदिर केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं, वे श्रद्धा के केंद्र हैं। हमें उनकी पवित्रता बनाए रखने के लिए नियमों को सख्त करने की आवश्यकता महसूस हो रही है।

एक स्थानीय मंदिर समिति के पदाधिकारी क्या होगा सरकार का रुख?
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार इस मुद्दे पर काफी सावधानी से कदम बढ़ाएगी। एक ओर देवभूमि की धार्मिक भावनाओं का दबाव है, तो दूसरी ओर उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा पर्यटन पर निर्भर है। यदि प्रतिबंध कड़े किए जाते हैं, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय और घरेलू पर्यटन पर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो वास्तविकता यह है कि अधिकांश देशों में चर्च और मस्जिद आम तौर पर सभी लोगों के लिए खुले रहते हैं, चाहे वह पर्यटक हों या किसी अन्य धर्म के अनुयायी। यूरोप, अमेरिका और एशिया के कई चर्चों में लोग वास्तुकला, इतिहास और संस्कृति को देखने के लिए स्वतंत्र रूप से प्रवेश कर सकते हैं, हालांकि पूजा के समय कुछ अनुशासनात्मक नियम लागू होते हैं। मस्जिदों के संदर्भ में स्थिति थोड़ी भिन्न है। कई देशों में प्रमुख मस्जिदें गैर-मुस्लिम पर्यटकों के लिए तय समय पर खुली रहती हैं, जैसे तुर्की, इंडोनेशिया और यूएई में। हालांकि, सऊदी अरब की मक्का और मदीना जैसी पवित्र मस्जिदों में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। भारत में भी कई मस्जिदों में गैर-मुस्लिमों को प्रवेश की अनुमति होती है, लेकिन नमाज के समय या धार्मिक मर्यादा के अनुसार कुछ पाबंदियां रहती हैं।

बता दें कि हर धर्म और हर स्थल की अपनी परंपरा, आस्था और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होती है, जिसके आधार पर प्रवेश के नियम तय किए जाते हैं। उत्तराखंड के चारधाम को लेकर भी यही तर्क दिया जा रहा है कि यह केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं, इसलिए इनके लिए अलग नियम बनाए जा सकते हैं। फिलहाल, उत्तराखंड में गैर-हिंदुओं की एंट्री पर बैन को लेकर कोई औपचारिक कानूनी आदेश सामने नहीं आया है, लेकिन इस विषय पर सहमति और समर्थन की खबरों ने धार्मिक स्वतंत्रता, परंपरा और समानता के बीच संतुलन को लेकर देशव्यापी चर्चा को तेज कर दिया है।

 

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