ग्रेटर नोएडा। अप्रैल 2026 में नोएडा औद्योगिक क्षेत्रों में वेतन वृद्धि की मांग को लेकर हुए श्रमिक आंदोलन और उसके बाद हुई हिंसा के मामले में अदालत ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। जिला अदालत ने सेक्टर-84 स्थित मदरसन कंपनी परिसर में पुलिस पर हुए हिंसक हमले और आगजनी के मामले में तीन आरोपियों—प्रियवंदा शर्मा, प्रेरित लोधा और शिवानी कौल—की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अदालत का यह फैसला सोमवार, 21 सितंबर 2026 को आया।
अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि केस डायरी में उपलब्ध साक्ष्यों, खासकर सह-आरोपियों मनीषा, रिचा, आकृति और अन्य के व्हाट्सऐप चैट तथा ऑडियो-वीडियो विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि ये तीनों भी आंदोलन के फोटो-वीडियो प्राप्त कर मजदूरों को भड़काने में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। शिवानी कौल के मामले में यह भी सामने आया कि वे टेलीग्राम चैनल पर बने ‘बिगुल मीडिया ग्रुप’ की सक्रिय सदस्य थीं। पुलिस का आरोप है कि ये आरोपी घटनाक्रम से जुड़े लोगों के संपर्क में रहकर हिंसा को भड़काने का काम कर रहे थे।
मामला थाना फेज-2 में दर्ज है। अभियोजन के मुताबिक, 13 अप्रैल 2026 को पुलिस बल क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए ड्यूटी पर था। इसी बीच मदरसन कंपनी के पास सैकड़ों की संख्या में श्रमिक वेतन वृद्धि की मांग को लेकर इकट्ठा हुए और सड़क जाम कर प्रदर्शन करने लगे। कुछ देर बाद भीड़ ने नियंत्रण खो दिया और पुलिस बल पर हमला कर पथराव शुरू कर दिया। कई पुलिसकर्मी घायल हुए। पुलिस के अनुसार यह घटना 450-500 अज्ञात व्यक्तियों द्वारा पूर्व-नियोजित साजिश के तहत अंजाम दी गई थी।
दूसरी ओर, आवेदकों के वकीलों ने दलील दी कि उनके मुवक्किल घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस के मनमाने रवैये को सोशल मीडिया पर उजागर करने के कारण उन्हें फर्जी तरीके से फंसाया गया है। अदालत ने अभियोजन पक्ष के पत्रों और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद आरोपियों को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
यह घटना अप्रैल 2026 के उस बड़े श्रमिक आंदोलन का हिस्सा है, जो मुख्य रूप से न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर शुरू हुआ था। 9-10 अप्रैल से शुरू हुए प्रदर्शन 13 अप्रैल को हिंसक हो गए। नोएडा के कई औद्योगिक सेक्टरों—फेज-2, फेज-3, सेक्टर-63, 67, 84 आदि—में तोड़फोड़, आगजनी और पुलिस पर हमले की घटनाएं हुईं। मदरसन, रिचा ग्लोबल, विपुल मोटर्स समेत कई कंपनियों के परिसर प्रभावित हुए। पुलिस ने सात प्रमुख एफआईआर दर्ज कीं, जिनमें सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया।
जांच के दौरान पुलिस ने कई आरोपियों के खिलाफ डिजिटल साक्ष्य, व्हाट्सऐप ग्रुप, टेलीग्राम चैनल और सोशल मीडिया पोस्ट्स को आधार बनाया। आरोप है कि कुछ कार्यकर्ताओं और संगठनों ने मजदूरों को उकसाने, भीड़ जुटाने और हिंसा को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई। बाद में कई मामलों में अदालतों ने साक्ष्यों की कमी का हवाला देते हुए जमानत दी, लेकिन जिन मामलों में सक्रिय भूमिका या साजिश के पर्याप्त साक्ष्य मिले, वहां जमानत खारिज की गई।
सूत्रों की एक पड़ताल के अनुसार, इन सात प्रमुख एफआईआर में कुल 222 जमानत आदेश आए, जिनमें से करीब 84 प्रतिशत मामलों में आरोपियों को राहत मिली। कई मजदूर औसतन 53 दिन जेल में रहे। अदालतों ने बार-बार कहा कि सिर्फ प्रदर्शन में मौजूदगी जमानत से इनकार का आधार नहीं हो सकती, ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। फिर भी, कुछ आरोपियों—खासकर जिन्हें भड़काने या संगठित करने का आरोप है—की याचिकाएं खारिज होती रहीं।
इस बीच कुछ प्रमुख आरोपियों को ऊपरी अदालतों से राहत भी मिली है। उदाहरण के लिए, पत्रकार सत्यम वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट से एक मामले में जमानत मिली, जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी पर लगाए गए एनएसए को भी हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। फिर भी कई अन्य मामलों में उनकी जमानत अभी भी लंबित या खारिज है।
मदरसन मामले में तीनों आरोपियों की अग्रिम जमानत खारिज होने से साफ है कि अदालत इस मामले को गंभीरता से ले रही है। पुलिस जांच अभी भी जारी है और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर और गिरफ्तारियां हो सकती हैं। श्रमिक संगठनों का कहना है कि वेतन वृद्धि की वैध मांग को हिंसा का रूप देकर मजदूरों को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि प्रशासन का रुख है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्राथमिकता है। यह मामला न केवल नोएडा बल्कि पूरे औद्योगिक क्षेत्र के मजदूर आंदोलनों और उनके कानूनी पहलुओं पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अदालत के इस ताजा फैसले से साफ है कि भड़काने और संपर्क में रहने जैसे आरोपों को अभी भी गंभीरता से लिया जा रहा है।

