Noida Metro Skywalk controversy: सेक्टर-51 और सेक्टर-52 मेट्रो स्टेशनों को जोड़ने वाला स्काईवॉक एक बार फिर सुर्खियों में है। यात्रियों की सुविधा के लिए शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट भारी लापरवाही का शिकार बना हुआ है। 2026 फरवरी तक भी यह स्काईवॉक जनता के लिए नहीं खुल सका है, जबकि इसकी लागत शुरुआती 26 करोड़ से बढ़कर 31-42 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है।
मुख्य समस्या बना मेट्रो पिलर निर्माण पूरा होने के बाद पता चला कि स्काईवॉक के रास्ते में दिल्ली मेट्रो का एक पिलर आ गया है। इस तकनीकी चूक के कारण पूरा ढांचा बेकार पड़ गया है। अधिकारियों ने कई बार निरीक्षण किया और काम को मंजूरी भी दी, लेकिन इस बड़ी गलती पर किसी का ध्यान नहीं गया। निर्माण कंपनी ने हाथ खड़े कर दिए हैं, क्योंकि मेट्रो पिलर को हटाना या काटना संभव नहीं है।
समय और बजट की भारी बर्बादी प्रोजेक्ट को शुरू में 6 महीने में पूरा करने का लक्ष्य था, लेकिन इसमें 3 साल से ज्यादा लग गए। डिजाइन बदलाव और अन्य कारणों से लागत लगातार बढ़ती गई। नोएडा प्राधिकरण के सीईओ ने लापरवाही के लिए अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए थे, लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है।
ताजा स्थिति (फरवरी 2026 तक) हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्काईवॉक अब भी बंद है और इस्तेमाल के लायक नहीं है। कुछ खबरों में भविष्य में इसे डिसमेंटल (तोड़ने) की चर्चा है, क्योंकि इलाके में नया शॉपिंग मॉल या अन्य विकास परियोजना आने की संभावना है, जिससे यह ढांचा बेकार हो जाएगा। जनता के पैसे के दुरुपयोग पर सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों में तीखी आलोचना हो रही है। कई लोग इसे भ्रष्टाचार और खराब प्लानिंग का जीता-जागता उदाहरण बता रहे हैं।
पिछले सालों में कई डेडलाइन (अक्टूबर 2025, फरवरी 2026 आदि) तय की गईं, लेकिन सभी मिस हो गईं। यात्रियों को अभी भी सड़क पार करके स्टेशन बदलना पड़ रहा है, जिससे ट्रैफिक और बरसात और गर्मी में भारी परेशानी होती है। नोएडा प्राधिकरण और NMRC से इस पर स्पष्ट जवाब की उम्मीद है, लेकिन फिलहाल जनता का 31-42 करोड़ रुपये डूबता नजर आ रहा है। यह मामला सरकारी परियोजनाओं में जवाबदेही और प्लानिंग की कमी को उजागर करता है।

