रॉकेट का प्रक्षेपण सुबह 10:18 बजे हुआ और शुरुआती चरण पूरी तरह सामान्य रहे। पहले दो चरणों ने सटीक प्रदर्शन किया, लेकिन तीसरे चरण में चैंबर प्रेशर में अचानक गिरावट दर्ज की गई। इससे रॉकेट की गति और दिशा में विचलन हो गया, तथा यह अनियंत्रित रूप से घूमने (रोलिंग) लगा। इसरो के अध्यक्ष वी. नारायणन ने मिशन कंट्रोल से घोषणा की, “मिशन में तकनीकी अनियमितता (अनॉमली) आई है। तीसरे चरण में आवश्यक थ्रस्ट नहीं मिला, जिससे रॉकेट निर्धारित पथ से भटक गया। सैटेलाइट्स को कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका।”
मुख्य पेलोड और खोए सैटेलाइट्स
• प्राथमिक सैटेलाइट: DRDO की रणनीतिक निगरानी सैटेलाइट ‘अन्वेषा’ (EOS-N1), जो 500 किमी ऊंचाई से सैन्य छद्मावरण को पहचानने में सक्षम थी।
• अन्य सैटेलाइट्स: 15 सह-यात्री सैटेलाइट्स, जिनमें भारतीय छात्रों के पेलोड, निजी कंपनियों के प्रयोग, स्पेन का KID री-एंट्री डेमॉन्स्ट्रेटर और ‘आयुलसैट’ जैसी नवाचारी तकनीकें शामिल थीं। ये सूर्य-सिंक्रोनस ऑर्बिट (505 किमी) में स्थापित होने थे।
2025 की असफलता की पुनरावृत्ति
यह PSLV का लगातार दूसरा असफल मिशन है। मई 2025 में PSLV-C61 मिशन भी तीसरे चरण में चैंबर प्रेशर ड्रॉप के कारण विफल हो गया था। PSLV को इसरो का ‘वर्कहॉर्स’ कहा जाता है, जिसकी सफलता दर 94% से अधिक रही है। अब तक इसके 63 मिशनों में यह दुर्लभ असफलताएं हैं, जो ठोस ईंधन मोटर, नोजल या केसिंग की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रही हैं।
इसरो ने आधिकारिक बयान में कहा, “PS3 चरण के अंत में अनॉमली दर्ज की गई। विस्तृत विश्लेषण शुरू कर दिया गया है।” विफलता विश्लेषण समिति गठित की जाएगी, और रिपोर्ट के आधार पर सुधार किए जाएंगे।
प्रभाव और आगे की राह
यह असफलता भारत के 2026 अंतरिक्ष कैलेंडर पर असर डालेगी, जिसमें 100 से अधिक सैटेलाइट्स का प्रक्षेपण, नेविक विस्तार और गगनयान की तैयारी शामिल है। निजी क्षेत्र की भागीदारी और व्यावसायिक राइडशेयर पर भी भरोसा प्रभावित हो सकता है। हालांकि, इसरो की टीम अपनी लचीलता के लिए जानी जाती है। अध्यक्ष नारायणन ने कहा कि जल्द सुधार कर ‘वर्कहॉर्स’ को मजबूत वापसी दिलाई जाएगी।
अंतरिक्ष विज्ञान में ऐसी चुनौतियां सामान्य हैं। इसरो ने चंद्रयान और आदित्य-L1 जैसे मिशनों से साबित किया है कि वह हर असफलता से मजबूत होकर उबरता है। देश वैज्ञानिकों के साथ खड़ा है।

