याचिका वकील कपिल मदान ने दाखिल की है। उनका तर्क है कि दिल्ली में AQI अक्सर ‘खतरनाक’ स्तर पर पहुंच जाता है, ऐसे में साफ हवा सांस लेना मौलिक अधिकार है। एयर प्यूरीफायर को लग्जरी आइटम मानना असंवैधानिक है और यह आम आदमी की पहुंच से बाहर कर देता है।
केंद्र सरकार ने कोर्ट में कड़ा विरोध जताया है। सरकार का कहना है कि GST दरें तय करना पूरी तरह GST काउंसिल का अधिकार है और कोर्ट का हस्तक्षेप ‘पावर सेपरेशन’ (शक्ति पृथक्करण) के सिद्धांत का उल्लंघन होगा। अगर एयर प्यूरीफायर को मेडिकल डिवाइस घोषित किया गया तो नियामक बाध्यताएं बढ़ेंगी, लाइसेंस की जरूरत पड़ेगी, जिससे बाजार में छोटे खिलाड़ी बाहर हो सकते हैं और कीमतें बढ़ सकती हैं। सरकार ने इसे ‘पैंडोरा बॉक्स’ खोलने वाला कदम बताया, क्योंकि फिर पानी फिल्टर या अन्य उत्पादों पर भी ऐसी मांगें आएंगी।
हालांकि, नवीनतम सुनवाई में केंद्र ने आश्वासन दिया है कि संसदीय पैनल की एयर प्यूरीफायर पर GST कम करने संबंधी सिफारिशों पर विचार किया जाएगा और प्रक्रिया पूरी की जाएगी। कोर्ट ने प्रदूषण के मद्देनजर GST कम करने की संभावना पर विचार करने को कहा था। मामला अभी विचाराधीन है और अगली सुनवाई जल्द होने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों की राय:
• कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ हवा का अधिकार मजबूत है, लेकिन कोर्ट सीधे टैक्स दरें तय नहीं कर सकता।
• GST काउंसिल ही अंतिम फैसला ले सकती है। कोर्ट ज्यादा से ज्यादा काउंसिल को निर्देश दे सकता है कि वह प्रदूषण डेटा और स्वास्थ्य प्रभाव के आधार पर विचार करे।
• मेडिकल डिवाइस क्लासिफिकेशन से टैक्स अपने आप कम नहीं होगा, क्योंकि GST अलग व्यवस्था है।
• विशेषज्ञ चेताते हैं कि फैसला अगर याचिका के पक्ष में गया तो कई अन्य उत्पादों पर मुकदमे बढ़ सकते हैं।
यह मामला न केवल टैक्स का है, बल्कि पर्यावरण संकट में स्वास्थ्य अधिकार और नीतिगत स्वायत्तता के बीच संतुलन का भी है। दिल्ली में प्रदूषण लगातार गंभीर बना हुआ है, ऐसे में लाखों लोग साफ हवा के लिए प्यूरीफायर पर निर्भर हैं।
ताजा जानकारी के अनुसार मामला कोर्ट में लंबित है, कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।

