ईरान-अमेरिका के बीच 45 दिन के सीजफायर पर बातचीत, अगले 48 घंटे निर्णायक — विफल हुई तो बड़े हमले की तैयारी

Iran and US War: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने को लेकर कूटनीतिक प्रयास तेज हो गए हैं। दोनों देशों के बीच 45 दिन के सीजफायर को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन इसके साथ ही यह भी साफ कर दिया गया है कि अगर यह डील नहीं हुई तो अमेरिका और इजराइल ईरान पर बड़े सैन्य हमले कर सकते हैं। मध्यस्थों ने चेतावनी दी है कि अगले 48 घंटे इस समझौते के लिए आखिरी मौका हैं।

क्या है प्रस्तावित समझौता

एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्तावित समझौते के पहले चरण में 45 दिन का सीजफायर लागू किया जाएगा। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति समझौते पर विस्तृत बातचीत होगी। यह एक प्रारंभिक कदम होगा जो आगे चलकर दीर्घकालिक शांति की नींव रख सकता है।

पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये निभा रहे मध्यस्थ की भूमिका

इस नाजुक कूटनीतिक प्रक्रिया में पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये मध्यस्थ की अहम भूमिका निभा रहे हैं। तीनों देश दोनों पक्षों के बीच संवाद का सेतु बनकर समझौते की राह तलाश रहे हैं। मध्यस्थों ने स्पष्ट किया है कि यह डील होगी या नहीं, इसका फैसला अगले 48 घंटों में हो जाएगा।

हमले की पूरी तैयारी कर चुके हैं अमेरिका और इजराइल

रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका और इजराइल ने ईरान के ऊर्जा संयंत्रों और इंफ्रास्ट्रक्चर ठिकानों पर बड़े हमले की पूरी योजना तैयार कर रखी है। यदि कूटनीतिक बातचीत विफल रही तो इन हमलों को अंजाम दिया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे हमले न केवल ईरान बल्कि पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र को अस्थिर कर सकते हैं।

ईरान बड़ी रियायत देने के मूड में नहीं

हालांकि ईरान अभी भी कुछ अहम मुद्दों पर कोई बड़ी रियायत देने के मूड में नहीं दिख रहा। होर्मुज स्ट्रेट, जो दुनिया की कच्चे तेल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण जलमार्ग है, और अपने परमाणु कार्यक्रम जैसे संवेदनशील विषयों पर ईरान किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं दिखता। यही दोनों मुद्दे इस डील की सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं।

क्यों अहम हैं ये 48 घंटे

मध्यस्थ देशों की चेतावनी और अमेरिका-इजराइल की सैन्य तैयारियों को देखते हुए आने वाले 48 घंटे न केवल ईरान और अमेरिका के लिए बल्कि पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बेहद निर्णायक साबित होंगे। होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है, ऐसे में किसी भी सैन्य कार्रवाई का असर वैश्विक तेल कीमतों और अर्थव्यवस्था पर सीधे तौर पर पड़ सकता है।

 

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