उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। उसकी तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है। खासतौर से मुसलमानों को साधने के लिए सपा का जोर इफ्तार पर है। कांग्रेस ने कई नेता भी इफ्तार करा रहे है। भाजपा में भी इफ्तार को लेकर जोश है। सवाल इफ्तार का नही बल्कि ये है कि हर साल रामजान आते है लेकिन इफ्तार इतनी संख्या में नही होते। मगर अब ज्यादातर सोशल मीडिया प्लेटफार्म इसकी फोटों से भरे मिलेगे। बसपा से कांग्रेस और फिर कांग्रेस से सपा में आए नसीमुद्दीन सिद्दीकी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर से जमीन तलाश रहे हैं इसीलिए उन्होंने रोजा इफ्तार पार्टी की जीत से समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया उसके अलावा इस इफ्तार पार्टी में सियासी आंकड़ों के हिसाब से लोगों को आमंत्रित किया गया। “सवाल इफ़्तार की खजूर का नहीं, उस हक का है जो संविधान ने दिया है लेकिन राजनीति ने छीन लिया है।”
1. टोकनिज्म (प्रतीकवाद) का खेल: टोपी और गमछे तक सीमित राजनीति
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इफ़्तार पार्टियां ‘सिम्बॉलिक पॉलिटिक्स’ का हिस्सा बन गई हैं। नेताओं के लिए यह एक ऐसा मंच है जहाँ वे खुद को “धर्मनिरपेक्ष” और “अल्पसंख्यक हितैषी” दिखा सकते हैं।
- उदाहरण: सालों से विपक्षी दलों और अब भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चों द्वारा भी भव्य इफ़्तार पार्टियां आयोजित की जा रही हैं। हाल ही में मेरठ और लखनऊ जैसे शहरों में बीजेपी और अन्य दलों द्वारा इफ़्तार के जरिए मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में पैठ बनाने की कोशिशें देखी गईं।
- हकीकत: यहाँ चर्चा कबाब और बिरयानी पर तो होती है, लेकिन उन गंभीर मुद्दों पर सन्नाटा रहता है जो सीधे तौर पर इस समुदाय को प्रभावित कर रहे हैं।


2. शिक्षा और रोजगार: फाइलों में दबे असली मुद्दे
सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट सालों पहले बता चुकी है कि भारतीय मुसलमानों की शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति दलितों से भी बदतर है। लेकिन किसी भी राजनीतिक इफ़्तार पार्टी में इन पर चर्चा नहीं होती:
- शिक्षा का अभाव: मुस्लिम बच्चों में ड्रॉपआउट रेट (स्कूल छोड़ने की दर) सबसे अधिक है। उच्च शिक्षा में उनकी भागीदारी आबादी के अनुपात में बेहद कम है।
- बजट में कटौती: अल्पसंख्यक मंत्रालय के बजट में हाल के वर्षों में की गई भारी कटौती या मौलाना आज़ाद नेशनल फैलोशिप (MANF) जैसी स्कॉलरशिप का बंद होना ऐसे मुद्दे हैं जिन पर इफ़्तार की मेज पर बैठे नेता चुप्पी साध लेते हैं।
3. सुरक्षा और न्याय पर सन्नाटा
मुस्लिम समुदाय आज जिन सबसे बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है, वह है असुरक्षा की भावना।
- जुर्म और मॉब लिंचिंग: पिछले कुछ वर्षों में भीड़ द्वारा हिंसा (Mob Lynching) और नफरती भाषणों (Hate Speech) की घटनाओं में वृद्धि हुई है। इफ़्तार पार्टियों में फोटो खिंचवाने वाले नेता अक्सर इन घटनाओं पर सदन में या सड़कों पर उस कदर मुखर नहीं होते, जितना वे एक दावत के आयोजन में सक्रिय दिखते हैं।
- कानूनी मुद्दे: यूएपीए (UAPA) जैसे कड़े कानूनों के तहत मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारी और लंबी जेल की सजा पर कोई भी राजनीतिक दल ठोस नीतिगत स्टैंड लेने के बजाय “इफ़्तार डिप्लोमेसी” को आसान रास्ता मानता है।
4. ‘सच्ची भागीदारी’ बनाम ‘सिर्फ वोट बैंक’
इफ़्तार पार्टियों में अक्सर मुस्लिम समुदाय के ‘अभिजात वर्ग’ (Elite class) या धर्मगुरुओं को ही बुलाया जाता है। आम गरीब मुसलमान, जो बुनकर है, छोटा दुकानदार है या दिहाड़ी मजदूर है, उसकी आवाज इन आलीशान होटलों की पार्टियों तक नहीं पहुँचती।
- उदाहरण: तेलंगाना और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कई बार मुस्लिम संगठनों ने इन पार्टियों का बहिष्कार करने की अपील की है। उनका तर्क है कि “हमें दावत नहीं, न्याय और हक चाहिए।”
निष्कर्ष: क्या बदला है
नेताओं के लिए इफ़्तार एक ‘लॉलीपॉप’ की तरह है—मीठा, लुभावना लेकिन पोषण से खाली। जब तक राजनीतिक दल इफ़्तार की मेज से उठकर संसद में मुस्लिमों की शिक्षा, सुरक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण पर कानून या ठोस नीतियां नहीं बनाएंगे, तब तक ये पार्टियां केवल एक इवेंट मैनेजमेंट बनकर रह जाएंगी।

