क्या हुआ था घटना? छात्रावास समाज कल्याण विभाग द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त निजी संचालित सुविधा है, जहां अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और विमुक्त जाति-घुमंतू जनजाति के गरीब परिवारों के बच्चे रहते हैं। हर छात्र को प्रतिमाह 2,200 रुपये की सब्सिडी मिलती है। कुल 46 छात्र (50 की क्षमता) यहां रहते थे। आरोपी छात्रों ने जूनियरों को अलग-अलग जगहों (हॉस्टल परिसर या आसपास की झाड़ियों में) ले जाकर अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया। पीड़ितों को चुप रहने के लिए मारपीट और धमकियों का सहारा लिया गया। कई माता-पिता ने बताया कि उनके बच्चे लगातार पेट दर्द की शिकायत करते थे, लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया गया।
मामला तब सामने आया जब एक पीड़ित छात्र ने विरोध किया और अपने माता-पिता को बताया। माता-पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए सातों आरोपी छात्रों को गिरफ्तार कर लिया। उन पर पॉक्सो एक्ट (बच्चों से यौन अपराधों से संरक्षण) और एंटी-रैगिंग एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। सभी आरोपी नाबालिग होने के कारण उन्हें गुरुवार को नासिक के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने पेश किया गया। पीड़ितों का मेडिकल परीक्षण कराया गया और फॉरेंसिक टीम ने हॉस्टल से सबूत इकट्ठा किए।
हॉस्टल अधीक्षक भी जांच के दायरे में नासिक ग्रामीण के एसपी बालासाहेब पाटिल ने कहा, “हॉस्टल अधीक्षक ने पुलिस को सूचित नहीं किया। हम यह भी जांच कर रहे हैं कि हॉस्टल प्रबंधन या ट्रस्ट को इसकी जानकारी थी या नहीं। अगर उनकी संलिप्तता पाई गई तो उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई होगी।” अधीक्षक ने दावा किया कि वे मात्र एक महीने पहले जॉइन किए थे और जैसे ही उन्हें पता चला, उन्होंने मैनेजमेंट को बताया, लेकिन उन्हें चुप रहने को कहा गया। कुछ रिपोर्ट्स में अधीक्षक पर भी पॉक्सो के तहत मामला दर्ज होने की बात कही गई है।
नासिक जिला कलेक्टर आयुष प्रसाद ने कहा, “चाइल्ड वेलफेयर कमिटी हॉस्टल का दौरा कर जांच करेगी। भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए कदम उठाए जाएंगे।” सोशल वेलफेयर कमिश्नर दीपा मुधोल मुंडे ने चेतावनी दी कि जांच रिपोर्ट में लापरवाही पाई गई तो हॉस्टल का लाइसेंस रद्द कर दिया जाएगा। सभी छात्रों को पास के अन्य सहायता प्राप्त छात्रावासों में शिफ्ट कर दिया जाएगा। हॉस्टल तुरंत बंद कर दिया गया है।
माता-पिता में आक्रोश
अधिकांश माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं, जो बच्चों को पढ़ाई के लिए हॉस्टल में रखते थे। एक माता-पिता ने कहा, “कौन जानता था कि यह इतना खतरनाक साबित होगा? मेरा बच्चा जीवन भर ट्रॉमा में रहेगा।” दूसरे ने पूछा, “कई महीनों से यह चल रहा था तो मैनेजमेंट को कैसे पता नहीं चला?” विशेष जांच टीम (इंस्पेक्टर सरिका अहिरराव के नेतृत्व में) अभी भी मामले की गहराई से जांच कर रही है। कोई नया आरोपी नहीं पकड़ा गया, लेकिन हॉस्टल प्रबंधन की भूमिका की जांच जारी है। जिला प्रशासन ने स्वतंत्र जांच के आदेश दिए हैं। यह घटना राज्य में छात्रावासों की सुरक्षा और निगरानी पर सवाल उठा रही है, खासकर गरीब और पिछड़े वर्ग के बच्चों की सुरक्षा को लेकर।
पुलिस ने अपील की है कि अगर कोई अन्य पीड़ित या गवाह आगे आए तो तुरंत संपर्क करें। यह मामला रैगिंग और बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ सख्त कानूनों के सख्ती से लागू होने का उदाहरण है। अधिक जानकारी और अपडेट्स के लिए बने रहिए।

