Health insurance and private hospitals’ “nexus”: लूट के आरोपों के बीच 2025 में उभरे नए तथ्य और सरकारी कदम

Health insurance and private hospitals’ “nexus”: भारत में हेल्थ इंश्योरेंस और बड़े निजी अस्पतालों के बीच कथित मिलीभगत की शिकायतें लंबे समय से चल रही हैं। आम लोग आरोप लगाते हैं कि इंश्योरेंस कंपनियां और कॉरपोरेट अस्पताल मिलकर मरीजों से ओवरचार्जिंग करते हैं, अनावश्यक जांचें थोपते हैं और क्लेम रिजेक्ट कर देते हैं, जिससे आम आदमी की जेब पर बोझ पड़ता है। 2025 में यह मुद्दा और गर्म हुआ है, जब रिपोर्ट्स में सामने आया कि सेक्टर को फ्रॉड और बर्बादी से सालाना 8,000 से 10,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।

बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) और मेडी असिस्ट की नवंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, हेल्थ इंश्योरेंस सिस्टम में धोखाधड़ी, बर्बादी और दुरुपयोग (FWA) के कारण यह भारी रिसाव हो रहा है। रिपोर्ट कहती है कि निजी अस्पताल इंश्योरेंस वाले मरीजों से ज्यादा बिल बनाते हैं, जबकि इंश्योरेंस कंपनियां क्लेम्स को ‘अनुचित खर्च’ बताकर रिजेक्ट कर देती हैं। परिणामस्वरूप, पॉलिसीधारकों का भरोसा टूट रहा है।

क्लेम रिजेक्शन और ओवरचार्जिंग की बढ़ती समस्या
IRDAI के आंकड़ों से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2023-24 में हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्शंस की राशि 26,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई, जो पिछले साल से 19% ज्यादा है। लोकलसर्कल्स के एक सर्वे (2024-25) में शामिल लगभग 50% पॉलिसीधारकों ने बताया कि पिछले तीन साल में उनका क्लेम पूरी या आंशिक रूप से रिजेक्ट हुआ। मुख्य कारण: दस्तावेजों की कमी, ‘अनावश्यक अस्पताल में भर्ती’ या ‘अनुचित खर्च’। कैशलेस डिस्चार्ज में भी देरी आम है – 60% मरीजों को 6 से 48 घंटे इंतजार करना पड़ता है।

निजी अस्पतालों पर सबसे बड़ा आरोप ओवरचार्जिंग का है। मरीजों की शिकायतें हैं कि इंश्योरेंस कवर होने पर बिल कई गुना बढ़ जाता है – जैसे साधारण कैनुला के लिए 5,000 रुपये या अनावश्यक टेस्ट। जुलाई 2025 में सरकार ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए नेशनल हेल्थ क्लेम्स पोर्टल को वित्त मंत्रालय और IRDAI के सख्त नज़र में लाने की योजना बनाई, ताकि मनमाने बिलों पर लगाम लगे।

दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप
दिलचस्प बात यह है कि आरोप एकतरफा नहीं हैं। अगस्त-सितंबर 2025 में कई निजी अस्पतालों ने कैशलेस सुविधाएं सस्पेंड कर दीं, आरोप लगाते हुए कि इंश्योरेंस कंपनियां जानबूझकर पेमेंट रोकती हैं और ‘कार्टेल’ जैसा व्यवहार करती हैं। दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन नर्सिंग होम फोरम ने IRDAI से शिकायत की कि जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के तहत कंपनियां मिलकर प्राइसिंग तय कर रही हैं। दूसरी तरफ, इंश्योरेंस कंपनियां अस्पतालों पर फ्रॉड का आरोप लगाती हैं।

सरकारी और रेगुलेटरी कदम
2025 IRDAI का सक्रिय साल रहा। अक्टूबर में ‘इंश्योरेंस फ्रॉड मॉनिटरिंग फ्रेमवर्क गाइडलाइंस’ जारी की गईं, जो फ्रॉड की निगरानी और रोकथाम के लिए नया ढांचा देती हैं। आयुष्मान भारत योजना के तहत 1,114 अस्पतालों को डी-एम्पैनल किया गया और 1,504 पर पेनाल्टी लगाई गई। संसद में भी यह मुद्दा उठा, जहां सांसदों ने प्राइवेट अस्पतालों की ‘लूट’ और इंश्योरेंस धांधली पर चर्चा की मांग की।

सोशल मीडिया पर भी गुस्सा साफ दिखता है। लोग कह रहे हैं कि अगर मरीज ‘जेब के हिसाब से इलाज’ कराने लगें, तो बड़े अस्पतालों का ‘धंधा’ ठप हो जाएगा – ठीक वैसे ही जैसे कई यूजर्स ने व्यक्त किया।

आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता, सख्त रेगुलेशन और डिजिटल पोर्टल की बेहतर निगरानी से समस्या कम हो सकती है। मरीजों को सलाह है कि पॉलिसी की शर्तें ध्यान से पढ़ें, बिल की हर मद जांचें और रिजेक्शन पर IRDAI ओम्बड्समैन या ग्राहक शिकायत फोरम में अपील करें।

यह मुद्दा सिर्फ लूट का नहीं, भरोसे का है। 2026 में सरकारी प्लान लागू होने पर देखना होगा कि आम आदमी को कितनी राहत मिलती है।

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