एम्स में हरीश राणा की इच्छामृत्यु प्रक्रिया जारी: वेंटिलेटर हटाया, नॉर्मल बेड पर शिफ्ट, हालत स्थिर लेकिन प्रक्रिया 2-3 सप्ताह तक चल सकती है

एम्स में हरीश राणा की इच्छामृत्यु प्रक्रिया जारी: दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में 32 वर्षीय हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से जारी है। सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च 2026 के ऐतिहासिक फैसले के बाद उन्हें 14 मार्च को गाजियाबाद के घर से एम्स के पैलेटिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया गया था। अब वेंटिलेटर और अन्य लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा दिए गए हैं, और उन्हें नॉर्मल बेड पर रखा गया है। अस्पताल सूत्रों के अनुसार, उनकी हालत फिलहाल स्थिर है, लेकिन शरीर को पोषण और हाइड्रेशन नहीं दिया जा रहा।

प्रक्रिया का अपडेट
• पहले चरण में फीडिंग ट्यूब (पोषण नली) पर कैप लगा दिया गया और पोषण बंद कर दिया गया।
• अब पानी देने वाली ट्यूब भी बंद कर दी गई है (मंगलवार से प्रभावी)।
• वेंटिलेटर हटाकर उन्हें सामान्य बेड पर शिफ्ट किया गया है।
• अभी भी दिमाग और दर्द प्रबंधन के लिए कुछ जरूरी दवाइयां दी जा रही हैं, ताकि उन्हें कोई पीड़ा न हो।
• एम्स ने 10 सदस्यीय विशेष मेडिकल बोर्ड गठित किया है, जिसमें एनेस्थीसिया, पैलेटिव मेडिसिन, न्यूरोलॉजी और मनोचिकित्सक शामिल हैं। यह बोर्ड हर रोज उनकी स्थिति की निगरानी कर रहा है।

डॉक्टरों और सूत्रों के मुताबिक, पूरी प्रक्रिया में 2 से 3 सप्ताह लग सकते हैं, क्योंकि यह धीरे-धीरे और दर्द रहित तरीके से की जा रही है। यह भारत में पैसिव यूथेनेशिया का पहला व्यावहारिक मामला है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने ‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ (अनुच्छेद 21) को मान्यता दी।

परिवार की स्थिति
हरीश की मां निर्मला देवी लगातार उनके साथ रह रही हैं, जबकि पिता अशोक राणा, भाई और बहन समय-समय पर मुलाकात कर रहे हैं। एम्स ने परिवार के लिए रहने की व्यवस्था की है और रोजाना काउंसलिंग सेशन हो रहे हैं, ताकि वे भावनात्मक रूप से तैयार रहें। विदाई के समय परिवार बेहद भावुक था – सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुए, जहां मां कह रही थीं, “सबको माफ कर दो, समय आ गया है…”। पिता ने अंगदान की इच्छा जताई है, लेकिन डॉक्टर प्रक्रिया पूरी होने के बाद देखेंगे।

पृष्ठभूमि
2013 में रक्षाबंधन के दिन चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से बीटेक कर रहे हरीश चौथी मंजिल से गिर गए थे। सिर में गंभीर चोट लगी, और तब से वे परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में हैं। 13 सालों तक परिवार ने हर इलाज आजमाया, लेकिन सुधार नहीं हुआ। हाईकोर्ट ने इच्छामृत्यु याचिका खारिज की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति दी। यह फैसला अरुणा शानबाग और कॉमन कॉज केस के दिशानिर्देशों पर आधारित है।

यह मामला ‘राइट टू लाइफ’ और ‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ पर राष्ट्रीय बहस छेड़ रहा है। एम्स की टीम सुनिश्चित कर रही है कि प्रक्रिया पूरी तरह मेडिकल प्रोटोकॉल और गरिमा के साथ हो। आगे की स्थिति पर नजर बनी हुई है।

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