रिपोर्ट्स के अनुसार, सर्वे के दौरान पाया गया कि पिछले कई वर्षों से रजिस्ट्री दस्तावेजों में नियमों की अनदेखी की जा रही थी। प्रॉपर्टी खरीद-फरोख्त (विक्रय विलेख) में बड़ी संख्या में एक ही पैन नंबर का कई अलग-अलग व्यक्तियों या लेन-देन में इस्तेमाल किया गया था। कुछ मामलों में पैन नंबर गलत दर्ज थे या पूरी तरह फर्जी थे। इससे भू-माफिया, बिल्डर्स और अन्य संदिग्ध तत्वों को फायदा पहुंचा, जबकि सरकार को भारी टैक्स चोरी का नुकसान हुआ।
आयकर विभाग की टीम ने कानपुर निदेशालय की देखरेख में गोपनीय ऑपरेशन चलाया। टीम का नेतृत्व संयुक्त निदेशक विजय सिंह ने किया, जबकि गाजियाबाद के स्थानीय आयकर अधिकारी सुधीर कुमार और उनकी टीम ने रिकॉर्ड्स की बारीकी से जांच की। सर्वे के दौरान डिजिटल डेटा, मूल रजिस्ट्री दस्तावेज और स्टेटमेंट ऑफ फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन (एसएफटी) रिपोर्ट्स को जब्त किया गया। इनसे यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि किन बिल्डर्स, रियल एस्टेट कंपनियों या व्यक्तियों ने फर्जी पैन के जरिए संपत्तियां खरीदीं या बेचीं।
यह मामला कानपुर और नोएडा के बाद गाजियाबाद में सामने आया है, जहां इसी तरह के सर्वे में करोड़ों के अनियमित लेन-देन पकड़े गए थे। सूत्रों के मुताबिक, अब प्रदेश के अन्य जिलों के रजिस्ट्री कार्यालय भी जांच के दायरे में हैं। विभाग ने गाजियाबाद उप-रजिस्ट्रार कार्यालय को डेटा सुधारने के निर्देश दिए थे, लेकिन लापरवाही बरती गई। आने वाले दिनों में रजिस्ट्री तैयार करने वाले वेंडर, अधिकारी और फर्जी पैन धारकों पर आयकर अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई हो सकती है, जिसमें जुर्माना, ब्याज और आपराधिक मुकदमे शामिल हैं।
स्टांप एवं रजिस्ट्रेशन विभाग के एआईजी पुष्पेंद्र कुमार ने घोटाले की खबरों का खंडन किया है। उन्होंने कहा कि 30 लाख से अधिक मूल्य की रजिस्ट्री पर एनएसडीएल पोर्टल के जरिए जानकारी साझा की जाती है। पैन न होने पर फॉर्म 60 भरकर अपलोड किया जाता है, और पोर्टल ओटीपी आधारित सत्यापन से जुड़ा है। हालांकि, विभाग की जांच जारी है और अगर कोई बड़ी अनियमितता मिली तो कार्रवाई होगी।
यह घटना रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता की कमी को उजागर करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल वेरिफिकेशन और आधार-पैन लिंकिंग को और सख्त करने की जरूरत है ताकि ऐसे घोटाले रोके जा सकें। जांच आगे बढ़ रही है, और जल्द ही गिरफ्तारियां या और खुलासे हो सकते हैं।

