Fake Cancer Medicines: अमेरिकी कंपनी मर्क एंड कंपनी (MSD) की बनाई इम्यूनोथेरेपी दवा कीट्रूडा (पेम्ब्रोलिजुमाब) कैंसर के इलाज में ‘मैजिक ड्रग’ मानी जाती है, लेकिन इसकी भारी कीमत (100 mg वायल के लिए 1.5 लाख रुपये से ज्यादा) के कारण ज्यादातर भारतीय परिवार इसे खरीद नहीं पाते। अब एक बड़े घोटाले में सामने आया है कि दिल्ली-एनसीआर के प्रतिष्ठित अस्पतालों से यह दवा लीक हो रही है और फार्मासिस्ट-फिक्सरों के नेटवर्क के जरिए खाली वायल्स को एंटी-फंगल दवाओं से भरकर फर्जी कीट्रूडा के रूप में बेचा जा रहा है।
एक जांच रिपोर्ट के अनुसार, अस्पतालों में इस्तेमाल हो चुकी खाली वायल्स या आधी भरी वायल्स को कर्मचारी निकालकर बाहर भेजते हैं। इन वायल्स को फिर से सील करके असली बैच नंबर्स के साथ पैक किया जाता है और लोकल मेडिकल स्टोर्स या ई-कॉमर्स के जरिए मरीजों को ‘डिस्काउंट’ पर बेच दिया जाता है। उदाहरण के लिए, असली कीमत से 40% कम यानी 90,000 रुपये में फर्जी वायल बेची जा रही है।
अस्पतालों से कैसे लीक हो रही दवा?
राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट (RGCIRC), दिल्ली: फार्मासिस्ट कोमल तिवारी और अभिनय पर आरोप है कि उन्होंने 10 आधी भरी वायल्स और 5 खाली बॉक्स निकाले। पूर्व कर्मचारी परवेज ने इनकी बिक्री कोऑर्डिनेट की।
वेंकटेश्वर अस्पताल, द्वारका: नर्सिंग टीम लीडर रोहित सिंह बिष्ट ने करीब 40 इंजेक्शन और 10-15 खाली वायल्स सप्लाई किए।
फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम: क्लिनिकल फार्मासिस्ट जितेंद्र ने 15-16 भरी वायल्स और 15-20 खाली वायल्स दीं।
खाली वायल के लिए 3,000 रुपये और भरी वायल के लिए 40,000-65,000 रुपये तक दिए जा रहे थे। व्हाट्सएप चैट्स में बैच नंबर्स (जैसे W031928, X018554) शेयर किए जाते थे, जो अस्पतालों के रिकॉर्ड से मैच कर रहे हैं।
मरीजों की मजबूरी का फायदा
चंडीगढ़ के एक मरीज के परिवार ने 12 वायल्स 16 लाख रुपये में खरीदीं, बाद में पता चला कि वे फर्जी थीं और एंटी-फंगल दवा से भरी हुई थीं। बिहार के एक मरीज ने दो इंजेक्शन 90,000 रुपये प्रत्येक में ई-कॉमर्स से खरीदे; दूसरी डोज के बाद उनकी हालत बिगड़ी और मौत हो गई। परिवार ने कहा, “छोटी-छोटी डिस्काउंट भी मायने रखती है… आप सिस्टम पर भरोसा कर लेते हैं।” फर्जी दवाओं में असली सक्रिय तत्व (पेम्ब्रोलिजुमाब) नहीं होता, जिससे इलाज बेकार हो जाता है और मरीज की हालत तेजी से बिगड़ सकती है।
गिरफ्तारियां और जांच
मार्च 2024 में दिल्ली पुलिस ने 12 सदस्यीय सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया। मुख्य आरोपी नीरज चौहान (डिस्ट्रीब्यूटर) के पास 46 भरी, 165 खाली वायल्स और 239 खाली बॉक्स बरामद हुए। वह जेल में है, कुछ अन्य को जमानत मिल गई। ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की। कुल 12,500 पन्नों के रिकॉर्ड और 150 मरीजों के ब्योरे की जांच हुई। अस्पतालों ने सुरक्षा बढ़ाई: कीट्रूडा मरीज के परिजनों की मौजूदगी में तैयार की जा रही है, CCTV लगाए गए, वेस्ट बिन लॉक किए गए। मर्क कंपनी ने कहा कि इस्तेमाल हो चुकी पैकेजिंग की जिम्मेदारी अस्पतालों की है। वे पुलिस को सपोर्ट कर रहे हैं और जब्त नमूनों की जांच भी की।
व्यापक समस्या
यह घोटाला सिर्फ भारत तक सीमित नहीं। ICIJ की वैश्विक जांच में अमेरिका, मैक्सिको आदि में भी कीट्रूडा की फर्जी वायल्स पकड़ी गईं। अमेरिका में एक भारतीय नागरिक संजय कुमार को फर्जी कीट्रूडा बेचने के लिए 43 महीने की सजा हुई। भारत में कैंसर केस 2045 तक 70% बढ़ने वाले हैं, लेकिन महंगी दवाओं की वजह से मरीज मजबूरन सस्ते विकल्प तलाशते हैं, जो उनके लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।
पुलिस कमिश्नर देवेश चंद्र श्रीवास्तव ने कहा, “यह मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है। ऐसे और सिंडिकेट्स पर नजर रखी जा रही है।” डॉक्टर सुधीर रावल (RGCIRC मेडिकल डायरेक्टर) ने बताया कि अब सख्त प्रोटोकॉल अपनाए गए हैं। यह मामला दवाओं की महंगाई, अस्पतालों में सुरक्षा लूपहोल्स और मरीजों की असहाय स्थिति को उजागर करता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और कंपनियों को सस्ती दवाओं की उपलब्धता और सप्लाई चेन की निगरानी बढ़ानी चाहिए, ताकि ऐसे घोटालों पर लगाम लगे।

