Economic Survey 2025-26: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने राज्यों द्वारा दी जा रही ‘फ्रीबीज’ या बिना शर्त नकद हस्तांतरण (अनकंडीशनल कैश ट्रांसफर- UCT) योजनाओं पर गंभीर चिंता जताई है। सर्वेक्षण के अनुसार, इन योजनाओं पर खर्च FY23 से FY26 के बीच पांच गुना बढ़कर इस वर्ष करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो राज्यों के राजस्व व्यय को बढ़ा रहा है और पूंजीगत निवेश (इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य) को निचोड़ रहा है।
सर्वेक्षण में चेतावनी दी गई है कि यदि इन योजनाओं में सुधार नहीं किया गया, तो ये स्थायी वित्तीय बोझ बन सकती हैं और राज्यों की वित्तीय स्थिति को खतरे में डाल सकती हैं। कई राज्य पहले से ही राजस्व घाटे (रेवेन्यू डेफिसिट) में हैं और उपभोग के लिए कर्ज ले रहे हैं, न कि संपत्ति सृजन के लिए। राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा (फिस्कल डेफिसिट) FY22 के 2.6% से बढ़कर FY25 में 3.2% हो गया है।
महिलाओं पर फोकस वाली योजनाओं का बोलबाला तमिलनाडु, महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल और हरियाणा जैसे राज्यों में महिलाओं को केंद्रित नकद हस्तांतरण योजनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इनसे लाभार्थियों को तत्काल राहत मिलती है—ग्रामीण घरों में ये खर्च का 40-50% कवर करती हैं और कुछ मामलों में महिलाओं की मासिक आय का 87% तक हिस्सा बन रही हैं। लेकिन सर्वेक्षण के अनुसार, ये योजनाएं पोषण, शिक्षा या गरीबी उन्मूलन में टिकाऊ सुधार नहीं ला रही हैं।
एक बड़ा नुकसान
ये योजनाएं महिलाओं की श्रम बल भागीदारी (फीमेल लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन) को कम कर रही हैं, क्योंकि नकद सहायता से रोजगार की जरूरत कम महसूस होती है।
समस्या की जड़: डिजाइन में खामी सर्वेक्षण कहता है कि समस्या मंशा में नहीं, बल्कि डिजाइन में है। ये योजनाएं ज्यादातर बिना शर्त हैं—रोजगार, स्किल ट्रेनिंग या सेवा वितरण से नहीं जुड़ीं। इनमें सनसेट क्लॉज (समय सीमा के बाद समाप्ति) का अभाव है, जिससे ये स्थायी खर्च बन जाती हैं। राजनीतिक रूप से इन्हें वापस लेना मुश्किल है, लेकिन आर्थिक रूप से ये राज्यों के बजट का बड़ा हिस्सा (कुछ में 8.26% तक) खा रही हैं।
समाधान: शर्तों वाली, समयबद्ध योजनाएं फ्रीबीज के दीर्घकालिक नुकसान से बचने के लिए सर्वेक्षण ने ब्राजील के बोल्सा फेमिलिया कार्यक्रम को मॉडल बताया। यह 2003 में शुरू हुआ था, जिसमें नकद सहायता स्कूल उपस्थिति, टीकाकरण और स्वास्थ्य जांच जैसी शर्तों से जुड़ी है। इसी तरह मैक्सिको का प्रोग्रेसा/ओपोर्टुनिडाडेस और फिलीपींस का पंताविद पमिल्यांग पिलिपिनो कार्यक्रम में नियमित मूल्यांकन और एग्जिट मैकेनिज्म हैं, जिससे लाभार्थी आत्मनिर्भर हो जाते हैं।
सर्वेक्षण की सिफारिश
भारत में भी फ्रीबीज को परिणाम-आधारित, शर्तों वाली और समयबद्ध बनाया जाए। नियमित ऑडिट और सनसेट क्लॉज जोड़े जाएं, ताकि कल्याण मानव पूंजी निवेश बने, न कि सिर्फ खर्च।
वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ये सुझाव अपनाए गए, तो राज्य पूंजीगत व्यय बढ़ा सकेंगे और विकास को गति मिलेगी। एक फ़रवरी को पेश होने वाले केंद्रीय बजट 2026-27 में इस मुद्दे पर सरकार की प्रतिक्रिया पर नजरें टिकी हैं।

